बस शगुन है
कविता
ऐसा लग रहा है कि पूरा दुनिया मेरे अंदर है
मैं जी नहीं रही बल्कि लग रहा है कि
मैं खुद ही एक जिंदगी हूं
इस साम में छत पर आकर बैठना
और इस चलती हुई
ठंडी हवाओं को धीरे-धीरे महसूस करना
इसमें शगुन है
इस शगुन को महसूस करके लग रहा है
कि यह दुनिया बस मेरे लिए है
और मैं एकलौता जिंदगी हूं
जो जी रही है
जो इस वक्त को इस पल को इस मौसम को
महसूस कर रही है
इस पल में कोई दुख नहीं है
कोई गम नहीं है
ना ही कोई खुशी है
बस शगुन है
सांसों में समाऐ हुए
जिस्म के कन कन में समाए हुए
और मैं इस वक्त यहां हूं
और इस पल को जी रही हूं
इस चलती हुई हवा को
इस ठंडी मौसम को महसूस कर रही हूं
सारे थकावट से उतर गई है
जिस्म की दर्द खत्म हो गई है
और इस वक्त किसी से शिकायत नहीं है
ना कोई चिंता है ना फिक्र
ना करता दिल भविष्य के जिक्र
ना उलझा है अतीत में जाकर
बस मैं यहां हूं
इस वक्त मैं बुद्ध हूं
बुद्ध की शांति की तरह मेरे मन की शांति है
मैं अभी एक चेतन हूं
इस पल में कुछ भी नहीं पता
बस अपने वजूद इस प्रकृति में मिलते हुए देख रही हूं
और इस प्रकृति को खुद में
और मैं और यह प्रकृति एक दूसरे में समाए हुए
यहां हूं
अभी यही परम सत्य है
इस ब्रह्मांड और मेरी