“बेटी “
जिसने जितना चाहा,
उतना मुझसे लिया गया,
और जब पहली बार
अपने लिए कुछ चाहा
तो वही चाह
मेरी सबसे बड़ी गलती बना दी गई।
देना मेरा फ़र्ज़ था,
माँगना मेरा गुनाह।
मैं पूछती हूँ
अपने लिए खड़ा होना
कब से बदतमीज़ी हो गया?
और “ना” कहना
कब से बदचलन होने की पहचान बन गया?
मेरी काबिलियत
चूल्हे की आँच पर परखी गई,
मेरे सपनों को
घर की दीवारों में
धीरे-धीरे गाड़ दिया गया।
हक़ की बात की
तो इज़्ज़त याद दिला दी गई,
जैसे इज़्ज़त
सिर्फ़ मेरी ज़िम्मेदारी हो,
और सहना
मेरी किस्मत।
यह समाज
बेटियों से पहले
उनकी आज़ादी छीन लेता है,
फिर कहता है
“हमने तुम्हें सब कुछ दिया।”
क्यों हर बार
इज़्ज़त के नाम पर
बेटियों को ही
कम समझा जाता है?
क्यों उनका चुप रहना संस्कार
और बोलना अपराध कहलाता है?
मैं बग़ावत नहीं लिख रही,
मैं बस वो सच लिख रही हूँ
जो हर बेटी
अपनी साँसों में दबा कर
ज़िंदगी जीती है।
प्राची तंवर