“बूंद से मिट्टी तक “……
आज सुबह उठी तो देखा बारिश पड़ रही थी…
हर बूँद पातों से होके ज़मीं पे गिर रही थी…
क्या ज़रूरी था बूँद का पत्तों से होके गुज़रना…
और इतनी मुश्किलों के बाद मिट्टी में मिल कर ख़ुद का वजूद ख़त्म करना?
हाँ, ज़रूरी था।
क्योंकि पत्ते की हथेली पर रुक कर बूँद ने जाना,
छुअन बिना भी कोई अपना होता है यही तो प्यार है।
पल भर का ठहराव, पूरी उम्र का करार है।
ज़मीन पर गिरना टूटना नहीं था…
वो तो मिट्टी की कोख में उतरना था।
बूँद मिट्टी न बने, तो अंकुर फूटेगा कैसे?
और अंकुर न फूटे, तो किसी थके हुए को छाँव मिलेगी कैसे?
हम भी तो बूँद ही हैं।
कभी किसी की बातों से टकरा कर ठिठक जाते हैं….. ये जैसे अपनेपन का मरहम है।
कभी हालातों के पत्थर पर गिर कर छिल जाते हैं ….ये ज़िंदगी का संघर्ष है।
कभी लगता है अब सब शून्य है, मन के भीतर घना अवसाद है…
कि साँसें चलती हैं पर जीने की आस नहीं है।
पर देखो न…
हर बार मिट्टी में खो जाने के बाद,
उसी जगह से एक नन्ही उम्मीद सर उठाती है।
वजूद मिटता नहीं,
वो बीज बन जाता है।
तो अगली बार जब बारिश देखो,
तो बूँद का गिरना मत गिनना…
उसका मिट्टी होना देखना।
क्योंकि जो खो गया लगता है,
वही किसी और के लिए उग आता है।
प्राची गुर्जर……