"....रकीब...."
अगर कभी
तुम्हें किसी रकीब की आहट भी न मिले,
समझना -
तुम मुझसे गुज़र आए हो
कई बरस पहले।
उसने मुझे सिखाना चाहा था
कि प्रेम
हमेशा एकतरफ़ा करना चाहिए।
मैंने उसके लिए
कोई विकल्प नहीं छोड़ा।
मैंने कभी
यह पाठ सीखा ही नहीं,
फिर भी
उम्र भर
एकतरफ़ा प्रेम करता रहा।
मैं चाहता था,
मेरे भीतर का अँधेरा
एक आख़िरी बार उठे,
और मृत्यु तक की इस यात्रा में
मैं बस
उसके रकीब का नाम
भूल सकूँ।
अब मेरे पास
न आँधियाँ हैं,
न बिजली,
न काला पानी।
आँखों में जो कुछ था,
वह टीस से भी पहले
सूख चुका है।
फिर भी
मैं क्या खोजता फिरता हूँ?
उसका बेतरतीब अक्स
अब भी टँगा है
भीतर की अँधेरी दीवारों पर।
उसने मुझे
पिछली सदी में ही
अलविदा कह दिया था।
तब मैं झूठ बोल सकता था।
मैंने भी मुस्कराकर कहा था -
अलविदा।