ठंडी हवा के झोंके थे,साथ पहाड़ों के साए थे,
बैठी थी मैं आंगन में,
एक अजब सी चाहत साथ में।
नजर टिकी थी दूर कहीं,पर्वत के शिखर पर,
कोई खोई सी सोच रही,मैं रात भर,
बस रात भर।चांद की वो रोशनी थी,तारों का वो घेरा था
,उस ऊंचे से पर्वत पर
,मानो जादू का कोई डेरा था।मां से पूछा—
मां बोलो,क्या छुपा है उस शिखर पर?
मां हंसकर बोली—
कुछ भी नहीं,बस बर्फ जमी है वहां पर।
पर मन यह मेरा माना नहीं,
नजरें टिकी थीं शिखर पर,
व्याकुल होकर सोच रही
,आखिर क्या है उस शिखर पर?
अब मन में एक आस जगी है
,सपनों की एक प्यास जगी है,
उस आसमान को छूने की,
अब एक नई जिद लगी है।
हां, मुश्किल राहें पार कर
,मैं एक दिन जाऊंगी,जमाना देखेगा जब मैं,
अपने हौसलों का परचम,
उस शिखर पर लहराऊंगी!