🌸एक ख़ालीपन-सा था🌸
एक ख़ालीपन-सा था, कभी इस सफ़र में,
तुम मिले तो मुसाफ़िर भी हमसफ़र लगे।
वक़्त की बेरुख़ी का भी अजब दस्तूर है,
जो अपने थे, वही आज बेख़बर लगे।
जब से तोहमतों का धुँआ उठा मेरे नाम पर,
हर आईना, हर चेहरा मुझे मुख़्तसर लगे।
हमने तो निभाई थी रिश्तों की हर रस्म,
मगर उन्हें हमारे जज़्बात बेअसर लगे।
अब न शिकवा है, न कोई गिला ज़िंदगी से,
जो मिला, वही मुक़द्दर का हुनर लगे।
✍️ — बेनी सागर