" मुकम्मल ख़्वाहिश "
हर ख्वाहिशें यहाँ मुकम्मल नहीं होती,
ज़िंदगी इस से कभी ख़त्म नहीं होती।
तन्हाई में छुप कर रोए हैं इस क़दर कि,
महफ़िलों में भी आँखें नम नहीं होती।
उज्जड़ गया है दिल का चमन कुछ यूँ की,
सुबह को भी फुलों पें शबनम नहीं होती।
हज़ारों लोग मिलते हैं जीवन के सफ़र में,
हर किसी की फ़ितरत मरहम नहीं होती।
छोड़ दिया मैंने मयख़ाने जाना, अब तो!
शराब हर दर्द की दवा हरदम नहीं होती।
छुपा लेता हूँ सीने में हज़ारों सदमे युँ हीं,
बयां आँखों से दास्ताँ-ए-गम नहीं होती।
तेरी बेवफ़ाई का क्या शिकवा करें हम?
वफ़ा 'व्योम' की तनिक कम नहीं होती।
✍...© विनोद. मो. सोलंकी " व्योम "
जेटको (GEB) अंजार. मु. रापर.