मां के निधन के लगभग एक महीने बाद रतन स्कूल लौटा था। टीचर ने उसे अपने पास बुलाकर सांत्वना दी तो वह रोने लगा। उसे रोता देख टीचर के साथ-साथ उसके दोस्तअजय की भी आंखें भर आईं। टीचर ने उसे हिम्मत बंधाते हुए सभी को उसका ध्यान रखने के लिए कहा।नन्हा रतन मां के असमय जाने के दुख में ऐसा डूबा कि पढ़ने लिखने से लेकर हंसना मुस्कुराना तक भूल गया । अजय और उसके दूसरे दोस्त उसे हर तरह से समझाकर हार चुके थे लेकिन वो अपनी मां के दुख से बाहर ही नहीं निकल पा रहा था।बच्चे तो आखिर बच्चे ही थे। कब तक उसके पीछे लगे रहते इसलिए धीरे-धीरे सभी अपने आप में मस्त हो गए लेकिन अजय वह कैसे अपने जिगरी दोस्त को अकेला छोड़ देता!लंच में सब खेलने के लिए बाहर चले जाते लेकिन अजय,रतन के साथ क्लास में ही बैठा रहता। मान मनुहार कर उसे खाना खिलाता और चटपटी बातें कर उसे हंसाने की कोशिश करता।आखिर अजय की दोस्ती रंग लाई। रतन अपने दुख से उबर फिर से मुस्कराने लगा था। अब फिर से दोनों दोस्त कक्षा की गतिविधियों में बढ़चढकर हिस्सा लेते और खेलते कूदते,उधम मचाते।
सरोज प्रजापति ✍🏻
- Saroj Prajapati