तुम नदी के उस किनारे,हम फंसे मझधार में।
चाहते हो और क्या अब
इम्तिहा ऐतबार में।
तुम सबक हो जिंदगी का, उम्र भूलेगी नहीं,
अब न बहकेंगे कदम
देख लेना प्यार में।
हम बड़े मासूम ठहरे,तेरी सादगी पर रीझ बैठे,
और हमको बेच बैठा,
तू भरे बाजार में।
जानता हूं ये दिए, जलते जलते,बुझ चलेंगे,
पर इनके सहारे कट सकेगी
ये रात इंतजार में।
अब किसी शिकवा शिकायत, की जगह बचती नहीं,
पहले जैसी अब मुहब्बत, है
कहां तकरार में।
कश्तियां उसपार कैसे,जा सकेंगी सोच लो,
जो छेद करके बैठे हो
नाव की पतवार में।
प्रिया अरविंद