स्याही का गिला
मुझे भी शामिल करो अपने बयानों में,
कुछ तारीफ मेरी भी हो महफ़िल-ए मुशायरोंमें,
कह कर स्याही रूठी है अंदाज-ए-कलमसे,
इजहार-ए-खयाल रुक गया झमेलों में ।
शायर का जवाब
वाकिफ़ हूं तेरे जज़्बात जो दवात में घूँट रहे है,
वोही तेरा जमीं से आसमाँ तक आला मक़ाम है ,
हर शायर की तू मुराद है सफर-ए-मुस्तकबिल है,
वरना कहाँ महफिले सजतीं तू ही वीराने में जान है ।
आख़िरी इज़हार
तू न उतरती काग़ज़ पर तो अशआ'र कहा होते,
तरन्नुम की बंदिश के घराने कहाँ होते,
ए मक़तूल-ए-जिगर, तुझसे ही बयां हूँ मैं जमाने में ,
शायर तो होते, पर महफ़िल-ए-बाज़ार कहाँ होते ।
अरुण गोंधली, आग (२५.०९.२०२६)