अपनी ही राहों में गुमसुम चला हूँ,
किसी और की अब ख़वाहिश नहीं।
दिए बुझ गए हों भले राह के,
मुझे रौशनी की भी चाहत नहीं।
खुद ही में खोकर, खुद ही को पाया,
तलाश-ए-सफ़र में ठिकाना मिला।
जो बिखरे थे तिनके मेरी आस के,
उन्हीं तिनकों से एक आशियाना मिला।
न मंज़िल की परवाह, न खोने का डर,
अपनी ही चाह में बहता हुआ,
मैं अपनी ही दुनिया का रज़ादार हूँ,
अपनी ही ख़ामोशी में रहता हुआ।