Hindi Quote in Poem by Ritu kumari

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हर एक साँस में छुपा हुआ एक नया फ़साना है,
ये रुक-रुक कर भी चलने का इक नाम ज़माना है।
ना इसकी कोई ज़ात प्रभु, ना इसका कोई धर्म हुआ,
जो सीने में महसूस हुई, बस वही आख़िरी मर्म हुआ।
​ग़म में ये भारी होती है, ख़ुशी में बहती हवा-सी,
दर्द मिले तो ये तड़पे, राहत में लगे दवा-सी।
जब-जब कोई मीत मिला, ये ज़रा तेज़ चलने लगी,
जब-जब कोई दीप बुझा, ये आहिस्ता ढलने लगी।
​बचपन की उस बेफ़िक्री में यह हँसती और मचलती थी,
चंचल-सी एक नदी जैसी हर पल यह बहती-चलती थी।
आई जवानी तो इसमें एक नया जुनूँ समाया था,
सपनों के पीछे भागते-भागते इसने ज़ोर लगाया था।
​फिर आई ठहराव की घड़ी, इसने सहसा विश्राम लिया,
दुनिया भर के इस शोर में चुपके से ईश्वर का नाम लिया।
​काँच का बर्तन है यह काया, साँसें इसकी डोरी हैं,
इसके बिन सब बातें झूठी, इसके बिन सब चोरी हैं।
जब तक यह आती-जाती है, जीवन में रंग़-तरंग भरे,
इसके थमते ही यह जग सारा एक पल में निस्पंद करे।

Hindi Poem by Ritu kumari : 112038255
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