हर एक साँस में छुपा हुआ एक नया फ़साना है,
ये रुक-रुक कर भी चलने का इक नाम ज़माना है।
ना इसकी कोई ज़ात प्रभु, ना इसका कोई धर्म हुआ,
जो सीने में महसूस हुई, बस वही आख़िरी मर्म हुआ।
ग़म में ये भारी होती है, ख़ुशी में बहती हवा-सी,
दर्द मिले तो ये तड़पे, राहत में लगे दवा-सी।
जब-जब कोई मीत मिला, ये ज़रा तेज़ चलने लगी,
जब-जब कोई दीप बुझा, ये आहिस्ता ढलने लगी।
बचपन की उस बेफ़िक्री में यह हँसती और मचलती थी,
चंचल-सी एक नदी जैसी हर पल यह बहती-चलती थी।
आई जवानी तो इसमें एक नया जुनूँ समाया था,
सपनों के पीछे भागते-भागते इसने ज़ोर लगाया था।
फिर आई ठहराव की घड़ी, इसने सहसा विश्राम लिया,
दुनिया भर के इस शोर में चुपके से ईश्वर का नाम लिया।
काँच का बर्तन है यह काया, साँसें इसकी डोरी हैं,
इसके बिन सब बातें झूठी, इसके बिन सब चोरी हैं।
जब तक यह आती-जाती है, जीवन में रंग़-तरंग भरे,
इसके थमते ही यह जग सारा एक पल में निस्पंद करे।