अजनबी
रिया जल्दी-जल्दी घर के काम खत्म करने में लगी हुई थी और बार-बार उसकी नज़र घड़ी की तरफ जा रही थी। आज कॉलेज में एक बहुत महत्वपूर्ण सेमिनार होने वाला था, जिसमें कुछ लोग बाहर से और कुछ दूसरे कॉलेज से आने वाले थे। उस सेमिनार की ज़िम्मेदारी रिया और उसके ग्रुप को दी गई थी।
30 साल की रिया में उसकी उम्र से कहीं ज़्यादा ठहराव था। वह हमेशा अपने शांत चेहरे पर एक मुस्कान ओढ़े रहती थी, जो उसकी आँखों की उदासी और दर्द को बखूबी छुपा लेती थी।
काम खत्म करने के बाद रिया ने अपने बिखरे बाल सँवारे और कॉलेज के लिए निकल गई।
बस में बज रहे एक पुराने गाने ने उसे अचानक उसके पुराने वक़्त में पहुँचा दिया। वही वक़्त, जहाँ रिया अल्हड़ थी, बेफ़िक्र होकर अपनी ज़िंदगी जिया करती थी। उसके लिए उसका प्यार उसकी पूरी दुनिया हुआ करता था। सुबह से लेकर रात तक उसकी ज़िंदगी बस उसी प्यार के चारों तरफ घूमती थी। उसे याद भी नहीं रहा था कि वह खुद भी एक इंसान है, उसकी अपनी भी कोई ज़िंदगी है और उसकी अपनी एक सेल्फ-रिस्पेक्ट भी है।
कच्ची उम्र के उस प्यार में रिया सामने वाले के व्यवहार को समझ ही नहीं पाई थी। जिसे वह प्यार समझकर इबादत कर रही थी, शायद दूसरे के लिए वह सिर्फ़ एक टाइम पास था। और जब उसका भरोसा टूटा, तो उसके साथ रिया भी पूरी तरह टूट गई। उसे सँभलने में आठ साल लग गए।
इन आठ सालों में रिया उस प्यार के सदमे से पूरी तरह बाहर नहीं आ पाई थी। लेकिन शायद उसी दर्द ने उसकी उम्र से कहीं ज़्यादा उसके भीतर एक ठहराव भर दिया था।
बस के अचानक ब्रेक लगने से एक झटका लगा और रिया अपने ख़यालों से बाहर आ गई। तभी उसकी सहेली अंजलि ने उसके कंधे पर हाथ रखकर कहा, “रिया, कॉलेज आ गया। उतरना है।” रिया ने अपना सामान सँभाला और बस से उतर गई। कॉलेज पहुँचते ही वह सेमिनार के काम में लग गई।
सेमिनार शुरू हुआ तो बाहर से आए लोगों में आकाश भी था। रिया को काम में व्यस्त देखकर उसने उसकी मदद करने की पेशकश की। आकाश लगभग रिया की ही उम्र का था, लेकिन अपनी उम्र के लोगों से थोड़ा ज़्यादा सुलझा हुआ। रिया थोड़ी झिझकी, लेकिन उसके पास उसकी मदद लेने के अलावा कोई रास्ता भी नहीं था।
दो घंटे के उस सेमिनार में रिया और आकाश के बीच बस हाय-हैलो हुई और काम को लेकर थोड़ी-बहुत बातचीत। इससे ज़्यादा कुछ नहीं। लेकिन एक महीने चलने वाले उस सेमिनार के कारण अब दोनों की रोज़ मुलाकात होने लगी। रिया से बात करने की पहल अक्सर आकाश को ही करनी पड़ती थी। वह बातचीत की शुरुआत तो करता था, लेकिन रिया की ख़ामोशी को भी उतनी ही इज़्ज़त देता था।
एक दिन सेमिनार शुरू होते ही रिया हॉल से उठकर बाहर आ गई। हाथ में कॉफी का कप लिए वह एक तरफ बैठकर अपने ख़यालों में खो गई। तभी आकाश भी वहाँ आ गया। उसने रिया के पास बैठने की इजाज़त माँगी रिया ने अपना दुपट्टा सँभाला और बिना कुछ कहे उसे बैठने की इजाज़त दे दी।आकाश उसके पास बैठ गया।
आकाश ने कॉफी की एक सिप लेते हुए पूछा, “आप हमेशा इतना चुप रहती हैं?” जवाब में रिया बस मुस्कुरा दी। आकाश ने फिर पूछा, “आप किस्मत पर यक़ीन करती हैं?” रिया ने उसकी तरफ देखा, हल्का सा मुस्कुराई और बहुत धीमी आवाज़ में बोली, “हाँ।”
शायद यह वही पहला जवाब था, जिसने आकाश को उसकी ख़ामोशी के पीछे छुपे सवालों के बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया। उसने फिर हल्के अंदाज़ में पूछा, “आप अपनी किस्मत से क्या चाहती हैं?”
इस सवाल पर रिया ने आकाश की तरफ देखा। कुछ पल चुप रही और फिर थोड़ी संजीदगी और दबी हुई आवाज़ में बोली, “अपने दिल का सुकून।”
आकाश बस उसे देखता रहा। रिया वहाँ से चली गई, लेकिन अपने पीछे आकाश के मन में कई सवाल छोड़ गई। उसकी ख़ामोशी में छुपे दर्द के सवाल। उसकी मुस्कुराती आँखों के किनारों में छुपी उस कहानी के सवाल, जो शायद वह किसी से नहीं कहती थी।
धीरे-धीरे रिया भी आकाश के साथ सहज होने लगी। अब वह सिर्फ़ आकाश के सवालों के जवाब नहीं देती थी, बल्कि उससे पलटकर सवाल भी करने लगी थी। कभी-कभी तो ऐसे सवाल कर देती, जिनका जवाब आकाश के पास मुस्कुराने के अलावा कुछ नहीं होता था।
एक दिन आकाश ने रिया से पूछा, “आपके according सबसे अच्छा रिश्ता कौन सा होता है?” रिया ने सहजता से जवाब दिया, “हसबैंड-वाइफ... माता-पिता का...” फिर अचानक रुक गई। एक गहरी साँस लेकर बोली, “पिता और बच्चे का रिश्ता कितना उलझा हुआ है।”
आकाश, जो उसकी बातें ध्यान से सुन रहा था, थोड़ा रुका और पूछा, “कैसे?”
रिया थोड़ी संजीदा हो गई। “पिता और बच्चे दोनों को एक-दूसरे से प्यार होता है, लेकिन फिर भी दोनों एक-दूसरे से कुछ कहने और अपना प्यार जताने में कतराते हैं।”
आकाश उसकी बात सुनकर मुस्कुरा दिया। “ये तो समाज ने ही ऐसा बनाया है और ऐसा ही चलता आ रहा है।”
रिया ने उसकी तरफ देखा। “आपको ऐसा क्यों लगता है?”
आकाश ने कहा, “माँ ही बच्चे को पालती है। पिता घर के बाहर कमाने की responsibility पूरी करता है।”
रिया मुस्कुरा दी और हल्के अंदाज़ में बोली, “आपको नहीं लगता, आप समाज की बात कर रहे हैं, लेकिन उसमें आपकी अपनी राय कहाँ है?”
आकाश के पास मुस्कुराने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। जाने-अनजाने में आकाश ने रिया के उस मन को छुआ था, जिसे शायद लंबे समय से किसी ऐसे ही स्पर्श की ज़रूरत थी—जो उसे बदलने की कोशिश न करे, बस उसे समझने की कोशिश करे।
आकाश ने रिया से कोई वादा नहीं किया था। फिर भी, दोनों एक-दूसरे के उस ख़ालीपन के लिए एक सहज-सा जवाब बन गए थे, जिसे शायद दोनों ने कभी शब्दों में समझाने की कोशिश भी नहीं की थी।
आख़िर सेमिनार का अंतिम दिन आ गया। अब दोनों को अपने-अपने रास्ते जाना था। दोनों आख़िरी बार मिले। वैसे ही सहजता से बात हुई। कुछ मुस्कुराहटें थीं, कुछ ख़ामोशियाँ थीं और फिर बिना किसी बड़े अलविदा के दोनों अपने-अपने रास्ते चले गए।
न फिर मिलने की कोई चाह थी, न कोई शिकवा-गिला। बस था तो एक शुक्रिया। रिया की ख़ामोशी को जगह देने के लिए। उसकी boundaries का सम्मान करने के लिए। और उस रिश्ते के लिए, जिसका कोई नाम नहीं था, फिर भी उसमें कुछ अधूरा नहीं था।
एक ऐसा रिश्ता, जिसे रिया वक़्त के किसी भी दौर में याद कर सके और बिना किसी झिझक के मुस्कुरा सके।
☆अनामकारा