⭐ एपिसोड 59 — “खून के पन्नों की शुरुआत”
कहानी — अधूरी किताब
काँच के टूटने की आवाज़ के बाद कमरे में एक भयानक सन्नाटा छा गया।
हवेली की ठंडी हवा भी मानो रुक गई थी।
सबकी नज़रें उसी अधूरी किताब पर टिक गई थीं, जो टूटे दर्पण के भीतर से बाहर गिरी थी—
जैसे सदियों बाद किसी ने उसका पिंजरा तोड़ दिया हो।
निहारिका काँपते हुए किताब के करीब गई।
उसके कंधे पर उभरा लाल चिन्ह हल्की-हल्की जलन दे रहा था,
मानो हर धड़कन के साथ वह उसे याद दिला रहा हो कि सच अभी खत्म नहीं हुआ…
सिर्फ शुरू हुआ है।
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📕 किताब का पहला पन्ना
कागज़ पुराने थे, पर शब्द जिंदा—
हर अक्षर जैसे किसी अदृश्य हाथ ने अभी-अभी लिखा हो।
जैसे ही किताब खुली, एक लाल रोशनी शब्दों पर पड़ी और वाक्य उभरा—
“वारिस के खून से ही पहला पाप जन्मा था।”
निहारिका का दिल लगभग रुक गया।
सिया ने झटके से पूछा—
“लेकिन पाप किसका? किसने किया था?”
आर्यन किताब के पास आया और धीरे से बोला—
“शायद उस पहली वारिस का… जिसका चेहरा दर्पण में दिख रहा था।”
अभिराज ने किताब को ध्यान से देखते हुए कहा—
“ये किताब हमेशा उसी के सामने खुलती है…
जिससे इसका खून का रिश्ता हो।”
निहारिका के कदम स्वतः पीछे चले गए।
उसकी आवाज़ टूट गई—
“तो… मैं भी उसी पाप का हिस्सा हूँ?”
अभिराज ने उसका हाथ पकड़ा,
उसका स्वर पहले से भी गंभीर—
“तुम पाप नहीं हो, निहारिका।
पर तुम्हारे भीतर वो खून है…
जो हवेली की हर दीवार को जगा देता है।”
निहारिका की आँखों से आँसू बहने लगे।
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🌑 किताब का दूसरा पन्ना— और बड़ा सच
किताब खुद-ब-खुद पलटी।
इस बार शब्द और गहरे, और डरावने लगे—
“पहला वारिस… अपनी ही बहन का खून बहाकर हवेली की शक्ति हासिल करना चाहता था।”
सिया की चीख निकलते-निकलते रह गई।
“उसने अपनी बहन को…?”
उसकी बात पूरी होने से पहले ही नया पंक्ति उभर आई—
“और वह बहन… वही थी जिसका चेहरा दर्पण में दिख रहा था।”
निहारिका को जैसे किसी ने भीतर से चीर दिया हो।
उसने धीरे से पूछा—
**“मतलब… दर्पण में जो लड़की थी…
वह पहली वारिस की बहन थी…”
सिया ने बात पूरी की—
“और उसे उसी के भाई ने… मार दिया।”
कमरे की हवा भारी हो गई।
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🩸 खून का रिश्ता — और गहरा झटका
किताब का तीसरा पन्ना खुला।
अभिराज ने शब्द पढ़े—
“पहली वारिस का वंश आगे नहीं बढ़ा।
पर उसकी बहन… जिसके खून से हवेली का श्राप टूटा भी और बना भी—
उसका खून आज भी जिंदा है।”
सबकी नज़रें धीरे-धीरे निहारिका पर टिक गईं।
निहारिका की आवाज़ काँप रही थी—
“तो… मैं किसकी वंशज हूँ?”
किताब ने खुद जवाब दिया—
**“तुम… उसी बहन की वारिस हो।
जिसका खून… हवेली को जगा सकता है।”**
एक झटके में निहारिका का संसार उलट गया।
उसका दिल टूट रहा था, लेकिन उसके कंधे पर उभरा लाल निशान और तेज़ चमकने लगा—
जैसे उस बात की पुष्टि कर रहा हो।
आर्यन बुदबुदाया—
“इसका मतलब… हवेली की सारी हलचल, सारी चीजें…
सब उसी की वजह से हो रही हैं।”
सिया ने डरते हुए कहा—
“अब यह हवेली उसे कभी छोड़ने वाली नहीं है…”
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🌪 कमरा अचानक हिल उठा
दीवारें थरथरा गईं।
छत से धूल गिरने लगी।
जैसे कोई अदृश्य चीज़ किताब की ओर बढ़ रही हो।
अभिराज ने तुरंत निहारिका को अपने पीछे कर लिया।
“पीछे रहो! ये किताब किसी की नहीं… सिर्फ वारिस की है!”
किताब की पन्ने तेजी से खुद-ब-खुद पलटने लगे।
और फिर एक पंक्ति उभरी—
**“वारिस जाग चुका है।
अब हवेली अपना हक लेगी।”**
कमरे की हवा के साथ सबकी साँसें जम गईं।
निहारिका ने बमुश्किल पूछा—
“हवेली मुझसे… क्या चाहती है?”
किताब के पन्ने रुक गए।
और लाल रोशनी में आखिरी वाक्य उभरा—
“खून का हिसाब।”
निहारिका के हाथ से किताब छूटकर जमीन पर गिर गई।
कमरे में खामोशी तैर गई—
और यह खामोशी आने वाले तूफ़ान का संकेत थी।
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⭐ एपिसोड 59 समाप्त