कुछ समय बाद राजन उस जगह लौट आया और फिर जल्द ही खाना पीना हो जाने के बाद राजन और उसके घरवालों ने विदा ली। त्रिशा के पापा ने तो रात तक रुक कल त्रिशा का जन्मदिन मनाने के बाद जाने का आग्रह किया किंतु उसे शिष्टाचार के साथ राजन के घरवालों ने अस्वीकार कर दिया।
उन लोगों के जाने तक शाम के पांच बज चुके थे और सुबह से लगे होने के कारण सभी थक भी गए थे इसलिए त्रिशा, मोनिका, कल्पना और त्रिशा की मामी आराम करने अपने कमरों में चली गई क्योंकि रात आठ बजे से फिर मेहमान आने वाले थे और फिर उनकी आहो-भगत में जो लगना था।
भले ही घर की सभी महिलाएं आराम करने चली गई हो लेकिन पुरुषों को अभी भी काम में ही लगना था। त्रिशा के पिता, मामा और दोनों भाई हलवाईयों के पास ही बैठे चाय पीते पीते उनसे काम करवा रहे थे और उन पर नजर भी रख रहे थे। अगर कोई सामान बीच में खत्म हो भी जाता तो तुरंत तन्मय या मानस में से किसी को भेजा जाता ताकि कोई कमी ना रह जाए।
वहीं बैठे बैठे कल्पेश ने चाय कि चुस्की लेते हुए कहा," चलो आज का सारा प्रोग्राम सही से निबट गया। नहीं तो जिस तरह अचानक सब हुआ यहीं लग रहा था कि पता नहीं कैसे हो पाएगा सब!!!!!"
त्रिशा के मामा सुदेश ने भी चुस्की भरी और बोले," हां भाईसाहब!!!!!! कैसे अचानक हुआ ना सबकुछ!!!!! पर जो भी हो लड़का अच्छा मिल गया हमारी बिटिया के लिए!!!!!!!! और घरवाले भी तो देखा ना आपने कितने सीधे से लग रहे थे ना!!!!!!"
"हां राजन लगा तो बड़ा समझदार बच्चा!!!! अरे बस जो भी हो बेटी सुखी रहनी चाहिए हमारी और हमें क्या चाहिए!!!!!!!" कल्पेश ने चाय का घूंट भरते हुए कहा।
"तो फिर भाईसाहब चलते हुए क्या बात हुई आपकी उन लोगों से????" सुदेश ने भी चाय का घूंट भरते हुए पूछा।
"कुछ नहीं बस यहीं बोल के गए है कि उनके कोई कुल गुरु है उन्हीं से शादी का मुहुर्त पूछ कर बताएंगे कि कब और क्या किस तरह से करना है।" कल्पेश ने बताया और अपनी चाय का आनंद पुन: लेने लगे।
"चलो जो भी हो बस सब सही से निबट जाए!!!! " सुदेश ने कहा।
"हां सुदेश बस हो जाए!!!! एक बार उनकी पक्की खबर आ जाए फिर बहुत सी तैयारियों में लगना है!!!!! अच्छा चलों तुम एक काम करना आज का रह फंक्शन हो जाए उसके बाद कल एक दिन का रेस्ट लेना और परसों से तुम लगना पेंडिंग पड़ी पैमेंटों को लाने में। और मैं जाकर बैंक में जाकर देखता हूं कि कितने पैसे है और वो जो एफडी करी थी हमने त्रिशा के नाम की उसे तुड़वाने की प्रक्रिया के बारे में पता करता हूं क्योंकि अब शादी हवा में तो होगी नहीं। कुछ गहने, कपड़े, सामान, कैस का इंतजाम तो करना पड़ेगा ना!!!!!! " कल्पेश ने चाय का आखिरी घूंट भरते हुए कहा।
"हां भाईसाहब!!! शादी ब्याह में खर्चा तो बहुत होता ही है और आजकल महंगाई भी तो कितनी बड़ गई है।।।। सोना ही देखो कितना मंहगा है आज की डेट में।" सुदेश ने भी अपना कप एक तरफ रखते हुए कहा।
"वहीं तो!!!! और फिर हम अपनी लड़की को क्या नहीं देगे बताओ!!!!! अब घर के सामान टीवी, फ्रिज, बैड, सोफा, अलमारी, ए०सी, पंखा कम से भी कम यह सब तो देना ही पड़ेगा ना। और थोड़े बहुत गहने भी बनवाने ही पड़ेगे। पता नहीं सब कुछ कैसे होगा!!!!!!! " कल्पेश ने भी अपना कप एक तरफ रखते हुए कहा।
"अरे भाईसाहब हो जाएगा सब क्यों परेशान होते हो!!!!!! हम सब है ना, मिल बांट कर अपनी त्रिशा की शादी देखना कितनी धूमधाम से करेगे।।।।।। और वैसे भी हमारी तो कोई बेटी है नहीं तो हम भी अपने अरमान त्रिशा की शादी में ही पूरी कर लेगे।" सुदेश ने कुर्सी से उठते हुए कहा।
सुदेश की बात सुनकर कल्पेश मुस्कुरा दिया और फिर दोनों उठकर काम में लग गए। रात को दावत का समय होने तक सारा खाना बनकर तैयार हो चुका था और बस उसे टेबलों पर लगाना बाकी था। वहां मौजूदों लोगों को आदेश देकर सभी लोग आने वाले मेहमानों की खातिरदारी में लग गए। धीरे धीरे एक एक कर मेहमानों का आना शुरु हुआ और कुछ समय तक खाली पड़ी जगह मेहमानों से खचाखच भर गई।
सभी लोगों कि उपस्थिती में पहले त्रिशा का केक कटवाया गया और फिर मेहमानों का खाना शुरु कराया गया। आए मेहमान खाना खाकर और त्रिशा को जन्मदिन का तोहफा और बधाई देकर जा रहे थे। त्रिशा को मां का सख्त आदेश था कि चाहे जो पूछे या जो हो पर राजन के बारे में अभी किसी को कुछ पता नहीं चलना चाहिए। और सिर्फ त्रिशा के लिए हि नहीं सभी के लिए यह आदेश था कि गलती से भी इस बात का जिक्र नहीं हो किसी के आगे इसलिए महक को भी आदेश मिला था कि वह अपना मुंह बंद रखे।