It doesn't matter in Hindi Short Stories by InkImagination books and stories PDF | कोई फर्क नहीं पडता

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कोई फर्क नहीं पडता

कोई फर्क नहीं पड़ता

वो कॉलेज की पुरानी, घिसी-पिटी सीढ़ियों पर बैठी रहती, घुटनों को सीने से चिपकाए। नीचे, ग्राउंड में हंसी का शोर था – वो लोग, जो कभी उसके साथ घंटों गप्पें मारते थे। अब वे फोन में उलझे रहते, किसी ग्रुप चैट में, किसी नई स्टोरी में। "अरे, देखो ये मेमे! हाहाहा!" कोई चिल्लाता, और बाकी सब हंस पड़ते। वो देखती रहती, जैसे एक सायबॉर्ग हो – मौजूद, लेकिन नजरअंदाज।
उसका नाम था नेहा।
साधारण नाम, साधारण जिंदगी।
दूसरे साल की स्टूडेंट, आर्ट्स की।
उसकी डायरी में लिखा रहता – "आज फिर वही। लोग हैं, लेकिन मैं नहीं।"
नेहा को हमेशा यही लगता। जैसे वो कमरे का वो कोना हो, जहां धूल जम जाती है, लेकिन कोई नोटिस नहीं करता। कॉलेज के फेस्ट में वो स्टेज के पीछे खड़ी रहती, दोस्तों की तालियां सुनती। "वाह, क्या परफॉर्मेंस!" वो चिल्लाते। नेहा सोचती, अगर वो गायब हो जाए, तो क्या कोई पूछेगा – "अरे, नेहा कहां है?"
दोस्त? हां, दोस्त तो थे।
पांच लड़कियां – प्रिया, नेहा (वो खुद), माही, सोनाली और रिया।
पहले साल में वे अटूट थीं। लाइब्रेरी में घंटों बैठकर नोट्स शेयर करतीं, कैंटीन में चाय की चुस्कियां लेते हुए बॉयफ्रेंड्स की थ्योरी बनातीं। नेहा की हंसी सबसे तेज होती – वो वाली हंसी जो पेट पकड़कर आती है। "यार, तू तो कमाल है नेहा! तेरी स्टोरीज तो कभी खत्म ही नहीं होतीं," प्रिया कहती। नेहा मुस्कुराती, लेकिन अंदर से सोचती – "कमाल? मैं तो बस बोल रही हूं, ताकि चुप न रहूं।"
लेकिन दूसरे साल में सब बदल गया।
लाइफ ने अपना जादू दिखाया। प्रिया को बॉयफ्रेंड मिला – वो वाला जो हमेशा बिजी रहता, लेकिन प्रिया को खुश रखता। माही का इंटर्नशिप का प्रोजेक्ट, सोनाली की फैमिली प्रॉब्लम्स, रिया का नया ग्रुप। नेहा? नेहा वही थी। न कोई बॉयफ्रेंड, न कोई प्रोजेक्ट। बस अपनी पुरानी डायरी और वो सवाल – "मेरा क्या?"
एक दिन कैंटीन में वो अकेली बैठी थी। प्रिया आई, हंसते हुए। "यार, कल पार्टी है! आ ना!" नेहा ने मुस्कुरा के कहा, "हां, आऊंगी।" लेकिन वो नहीं गई। क्यों? क्योंकि पार्टी में वो फिर वही होगी – कोने में खड़ी, ग्लास हाथ में लिए, लोगों को देखती। "अरे नेहा, तू भी डांस कर ना!" कोई कहेगा, और वो मुस्कुराएगी – "नहीं यार, मूड नहीं।" सच तो ये था कि मूड हमेशा था, लेकिन जगह नहीं।
फिर वो इंसान था।
उसका नाम अर्जुन।
कॉलेज का सीनियर, इंजीनियरिंग का।
नेहा ने उसे पहली बार लाइब्रेरी में देखा था। वो किताबें ढूंढ रहा था, नेहा ने मदद की। "ये वाला ले लो, अच्छा है।" बस, बात शुरू हो गई। चैट्स, कॉफी डेट्स (जो कभी कॉफी नहीं रहीं, बस बातें), और नेहा का दिल। अर्जुन उसके लिए स्पेशल था – वो वाला स्पेशल जो रातों को जगाता है। वो नेहा को सुनता, हंसाता, कभी-कभी "मिस यू" भी बोल देता। नेहा सोचती, "शायद ये वो है, जिसके लिए फर्क पड़ता है।"
लेकिन धीरे-धीरे मैसेज कम होने लगे।
"हाय, कैसी है?" नेहा पूछती।
"अच्छी, तू बता।" वो।
फिर सवालों की बाढ़। नेहा के पास।
"आज क्या किया?"
"कुछ स्पेशल?"
"मिस कर रही हूं।"
जवाब? "बिजी हूं यार, कल बात करते हैं।"
कल कभी नहीं आता। नेहा फोन देखती रहती, "लास्ट सीन" का समय चेक करती। "दो घंटे पहले ऑनलाइन था। तो क्या मैं इतनी भी इंपॉर्टेंट नहीं?" रात में बेड पर लेटी, छत की तरफ देखती। आंसू आते, लेकिन वो रोती नहीं। बस सोचती – "क्या कोई इतना बिजी हो सकता है कि एक 'हाय' तक न भेज सके? या फिर... मैं उसके लिए वैल्यू नहीं रखती?"
एक शाम कॉलेज के गेट पर अर्जुन मिला। नेहा ने हिम्मत की, "हाय।" वो मुस्कुराया, "अरे नेहा! लंबे समय। कैसी है?" नेहा ने हंसने की कोशिश की, "ठीक। तू?" वो बोला, "अच्छा, प्रोजेक्ट में डूबा हूं। यार, तू तो जानती है ना?" नेहा ने सिर हिलाया। जानती थी। लेकिन अंदर से चीख रही थी – "हां जानती हूं, लेकिन क्या तू जानता है कि तेरी ये बिजीनेस मुझे कितना काट रही है?" वो चुप रही। क्यों? क्योंकि बोलने से क्या फर्क पड़ता? वो फिर भी बिजी रहेगा।
दोस्तों के साथ भी यही था। ग्रुप चैट में नेहा मैसेज भेजती – "यार, कल मूवी देखें?" प्रिया: "हां!" माही: "कूल!" लेकिन अगले दिन? "सॉरी यार, फैमिली इमरजेंसी।" "मैं लेट हो गई।" नेहा अकेली सिनेमा हॉल के बाहर खड़ी रहती, टिकट हाथ में लिए। "फर्क नहीं पड़ता," वो खुद से कहती। लेकिन पड़ता था। बहुत।
रातें सबसे काली होतीं। जब घर शांत हो जाता, मम्मी-पापा सो जाते। नेहा कमरे की लाइट बंद कर, फोन की स्क्रीन पर पुराने मैसेज स्क्रॉल करती। अर्जुन के "गुड नाइट" वाले, दोस्तों के ग्रुप फोटोज। "अगर मैं स्पेशल होती, तो क्या कोई यूं भूल जाता?" आंसू गालों पर लुढ़कते। वो खुद को कंसोल करती – "शायद वो बिजी हैं। शायद मैं ही ओवरथिंक कर रही हूं।" लेकिन दिल जानता था – ये बहाने हैं। सच ये है कि नेहा उनके लिए 'ऑप्शन' थी, 'प्रायोरिटी' नहीं।
कॉलेज में वो लोगों के बीच घुलमिल जाती। हंसी उछालती, जोक्स मारती। "नेहा, तू तो रॉकस्टार है!" कोई कहता। वो हंसती, लेकिन आंखें चुरा लेती। क्योंकि हंसी एक मास्क थी। ढाल। ताकि कोई उसकी खालीपन की गहराई न देख ले। शिकायत? कभी नहीं। क्यों? क्योंकि शिकायत करने के लिए तो किसी का 'अपना' होना जरूरी होता। नेहा का कोई अपना नहीं था। सबके पास तो थे – बॉयफ्रेंड, फैमिली, नए दोस्त। नेहा के पास? बस वो सवाल – "क्या मैं इतनी भी वैल्यू नहीं रखती?"
सबसे ज्यादा दर्द तब होता, जब वो देखती – लोग उसके बिना भी हंस रहे हैं। प्रिया का ग्रुप बिना नेहा के पार्टी कर रहा। अर्जुन की स्टोरी में कोई और लड़की। "वो मेरे बिना भी परफेक्ट हैं। और मैं? उनके बिना अधूरी।" एक रात नेहा ने डायरी में लिखा – "क्या ऐसा सिर्फ मेरे साथ है? या दुनिया में और भी नेहा हैं – जो भीड़ में खड़े होकर भी खुद को इनविजिबल फील करते हैं? जो मैसेज भेजते हैं, लेकिन रिप्लाई का इंतजार करते-करते थक जाते हैं?"
फिर वो दिन आया।
बारिश हो रही थी। कॉलेज खत्म होने के बाद नेहा सीढ़ियों पर अकेली बैठी। फोन निकाला। अर्जुन को आखिरी मैसेज टाइप किया – "तुम ठीक हो?"
सेंड।
टाइम: 6:32 PM।
लास्ट सीन: 6:35 PM।
फिर... कुछ नहीं।
नेहा ने फोन जेब में रखा। बारिश की बूंदें उसके चेहरे पर गिर रही थीं। आंसू? नहीं। पहली बार वो रोने की कोशिश नहीं की। बस चुपचाप बैठी रही। हवा में एक आवाज गूंजी – खुद की। "बस। अब बहुत हो गया।"
उस रात नेहा ने आईने के सामने खड़ी होकर खुद से कहा – "अगर किसी की नजरों में तेरी वैल्यू नहीं, तो कम से कम अपनी तो रख। तू स्पेशल है। तू फर्क पैदा कर सकती है।" अगली सुबह वो कॉलेज गई। वही सीढ़ियां, वही लोग। लेकिन फर्क था। नेहा ने प्रिया को रोका। "यार, आज लंच साथ करें?" प्रिया हिचकिचाई, "हां, क्यों नहीं?" नेहा ने हंसकर कहा, "नहीं, सिर्फ हम दोनों। पुरानी वाली बातें।" प्रिया मुस्कुराई।
अर्जुन को? नेहा ने एक मैसेज भेजा – "टेक केयर।" फिर ब्लॉक। नहीं गुस्से में। बल्कि, आजादी के। "मैं अब इंतजार नहीं करूंगी।"
दिन बीतने लगे। नेहा ने एक नया ग्रुप जॉइन किया – बुक क्लब। वहां वो बातें करती, हंसती – बिना मास्क के। दोस्त बने, जो नेहा को 'नेहा' के लिए चाहते। एक दिन अर्जुन का मैसेज आया – अनब्लॉक करके। "क्यों ब्लॉक किया?" नेहा ने रिप्लाई किया – "क्योंकि मुझे फर्क पड़ता है। और अब मैं खुद से फर्क पड़वाऊंगी।"
अब नेहा सीढ़ियों पर नहीं बैठती। वो ऊपर चढ़ती है। लोगों के बीच। हंसती है – सच में। लेकिन कभी-कभी रुक जाती। सोचती – "क्या तुम्हें भी ऐसा लगा है? वो फीलिंग जब लगे कि तुम्हारा होना बेकार है? क्या तुमने कभी किसी को मैसेज किया, और वेट करते-करते खुद को खो दिया?"
और फिर मुस्कुरा देती। क्योंकि अब वो जानती है – फर्क पड़ता है। हमेशा। बस, कभी खुद से पूछना पड़ता है।
तुम्हें क्या लगता है? क्या कभी तुम्हें लगा कि तुम्हारा होना किसी के लिए 'फर्क' नहीं पड़ता? या फिर, वो मोमेंट जब तुमने खुद को प्रायोरिटी बनाया? कमेंट में शेयर करो – शायद किसी की स्टोरी तुम्हारी तरह ही हो, और वो पढ़कर मुस्कुरा दे।