"इतने कम समय में शादी????" कल्पना ने चिंतित होकर कल्पेश की ओर देखते हुए कहा।
"वहीं तो कल्पना, इतने कम समय में इतना सारा इंतजाम करना है!!!!!" कल्पेश ने चिंतित स्वर में सभी से कहा।
कल्पेश की बात सुनकर सभी लोग कुछ चिंतित हो गए। शादी पक्की होने से सभी खुश तो थे पर कुछ घबरा भी रहे थे कि इतने कम समय में इतनी सारी तैयारी कैसे करेगे। लड़की की शादी है कोई कमी रह गई तो जीवन भर का ताना हो जाएगा हमारे लिए भी और बेटी के लिए भी। घर के सभी बड़े इसी सोच में डूबे थे।
"अरे क्यों चिंता करते हो फुफा जी, हम सब है ना!!! हम सब मिलकर सब मैनेज कर लेगे। आप टेंशन ना लिजिए और बस शादी की तैयारी शुरु कर दिजिए।" मानस ने कल्पेश को तसल्ली देते हुए कहा।
"हां भाईसाहब।। हम सब लोग है ना मिलकर सब संभाल लेगे। और वैसे भी त्रिशा इस घर की एकलौती बेटी है इसलिए इसकी शादी में हम कोई कसर या कमी नहीं होने देगे। देखिएगा इतनी धूमधाम से सब करेगे कि पूरा कानपुर शहर चर्चा करेगा। " सुदेश ने भी कल्पेश से त्रिशा की ओर देखते हुए कहा।
त्रिशा जो अभी तक चुपचाप खड़ी यह सब देख और सुन रही थी वह अपने भावों को खुद समझने की कोशिश करने में लगी थी।" मेरी शादी होने जा रही है और वह इस घर से हमेशा के लिए चली जाएगी यह सोच कर मुझे खुश होना चाहिए या फिर दुखी!!!!!" त्रिशा मन ही मन खुद से बोली।
फिर उसने एक के एक अपने घरवालों की बातों में उसकी शादी के प्रति जो उत्साह और खुशी देखी उसे देखकर त्रिशा ने खुश होने का ही फैसला किया और वह एक शालीन मुस्कान के साथ अपने मामा की बात की प्रतिक्रीया दे वह फिर चुपचाप खड़ी हो गई और सबकी बातें सुनने लगी।
"हम्ममममम!!" कल्पेश ने एक लंबी गहरी सांस ली और सबकी ओर देख कर कहा, "कल्पना, सुदेश, मानस!!!!!
देखो अब हां तो वैसे भी कर ही दी है हमने उनको तो फिर यूं परेशान होने से तो कुछ होगा नहीं अब करना तो पड़ेगा ही हमें सबकुछ। तो तुम लोग फिर आज कल में ही तैयारियां करनी शुरु कर दो।"
कल्पेश ने कुछ सोचा और वह बोला , " कल्पना सुनो तुम मेरे साथ आज बैंक चलना पहले तो हम अपनी एफ०डी और सेविंग्स देखते है। और फिर हम वापसी में सुनार की दुकान पर हो आएंगे और हां सुदेश तुम मार्केट में हमारी जितनी भी बाकी की पैमेंट बची है सब लेनी शुरु कर दो क्योंकि अभी सबसे पहले पैसे जोड़ने है। खर्चा बहुत है आगे।" कल्पेश ने उन दोनों को आदेश देते हुए कहा।
इससे पहले कल्पना और सुदेश कोई प्रतिक्रीया देते, कल्पेश ने कहा, " और हां सुदेश सुनो तुम भी हमें सुनार की दुकान पर मिलना और अपनी बहु को भी साथ ले आना। हम वहां आज जाकर गहनों का देख लेते है।" कल्पेश ने उन दोनों को आदेश देते हुए कहा।
"और हां सुनो, जरा त्रिशा को भी अपने साथ ले आना सुदेश। क्या है ना वह अपनी पसंद से जो लेना चाहेगी ले लेगी। अब वैसे भी हमें तो देना है ही तो क्यों त्रिशा कि पसंद का ही दिया जाए!!!!!" कल्पेश ने त्रिशा की ओर देखकर कहा।
"जी ठीक !!!!" दोनों भाई बहन कल्पना और सुदेश ने एक साथ कल्पेश की ओर देखकर कहा।
"और हां बेटा मानस तुम जाओ अभी अपने काम पर और जरा देखो पता करो तुम्हारी जानकारी में कोई कार्ड छापने वाला और मैरिज होम वाला है क्या???" कल्पेश ने मानस को देखकर कहा।
"जी ठीक है फुफा जी। मैं पता करके बताता हूं आपको!!!" मानस ने उनसे कहा।
"पापा और मैं क्या करुंगा???" तन्मय ने उत्साहित होकर कल्पेश की ओर देखते हुए कहा।
"तन्मय तुम अभी के लिए बस केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो। तुम्हारी दसवीं की बोर्ड परीक्षा हो जाएं फिर तुम्हें काम देगें!!!" कल्पेश ने तन्मय को देखते हुए कहा।
"जी पापा!!!" तन्मय ने निराश होते हुए कहा।
"और दीदी क्या करेगी????" तन्मय अपनी मां कि ओर देखकर पूछा।
"तेरी दीदी तो बस आराम करेगी! अच्छा अच्छा खाएगी और अच्छा अच्छा पहनेगी और बस बैठे बैठे तुमसे काम करवाएगी!!!!" कल्पना ने हंसते हुए कहा।
"अरे वाह मतलब शादी इनकी और यह ही आराम करेगी। कोई काम नहीं करेगी??? रह सही है इनका।" तन्मय ने मुंह बनाते हुए त्रिशा की ओर देखकर कहा।
" अपनी शादी में भला कौन काम करता है!!!!! और मैं क्यूं करु काम तुम हो तो मेरी शादी में काम करने के लिए!!!" त्रिशा ने भी तन्मय को मुंह चिढ़ाते हुए कहा।
"अच्छा अब बस करो तुम दोनो!!!!! चलो सब लोग जल्दी से नाश्ता करों और फिर अपने अपने काम पर जाओ। अब काम बहुत है और समय कम है तो यह फालतू का समय बर्बाद ना करो। " कल्पेश ने सबकी ओर देखकर कहा और फिर सभी अपना नाश्ता पूरा कर अपने अपने काम को निकल गए।