That city, that girl in Hindi Love Stories by InkImagination books and stories PDF | वो शहर, वो लड़की

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वो शहर, वो लड़की

की वो भागती-दौड़ती शामें।

ट्रैफिक की लंबी कतारें, हॉर्न की आवाजें, और हवा में घुली हुई चाय की खुशबू।

आरव मल्होत्रा, सत्ताईस साल का।

उसका नाम सुनते ही लोग थोड़ा सा सिकुड़ जाते थे – दिल्ली के बिजनेस सर्कल में उसकी तूती बोलती थी। सूट-बूट, चमचमाती काली मर्सिडीज, और आंखों में वो ठंडक जो कहती थी – "समय बहुत कीमती है।"

उसकी जिंदगी में मीटिंग्स थीं, डील्स थीं, विदेशी ट्रिप्स थे।

प्यार? वो शब्द उसके लिए किसी पुरानी फिल्म का डायलॉग लगता था।

उसी शहर की एक छोटी-सी गली में रहती थी अन्वी।

अठारह साल की।

कॉलेज का पहला साल।

उसका घर छोटा था – दो कमरे, एक छोटी किचन, और छत पर मां के लगाए तुलसी का पौधा।

पापा गुजर चुके थे, मां सिलाई का काम करतीं।

अन्वी की आंखों में सपने थे – डॉक्टर बनने के, मां को अच्छा घर देने के।

वो लड़की जो बस में खिड़की की सीट पाकर मुस्कुरा उठती थी।

बड़े लोग उसे डराते थे। खासकर वो लोग जिनके नाम से अखबारों में हेडलाइंस बनती थीं।

पहली मुलाकात बारिश ने करवाई।

जुलाई की वो शाम। दिल्ली की सड़कें पानी से लबालब।

अन्वी बस स्टॉप पर खड़ी थी, किताबें सीने से चिपकाए। फोन की बैटरी डेड, पर्स में पैसे गीले। बस नहीं आ रही थी।

तभी एक काली मर्सिडीज धीरे से रुकी।

ड्राइवर उतरा, छतरी लेकर। "मैडम, सर कह रहे हैं – लिफ्ट ले लीजिए। बारिश तेज है।"

अन्वी ने गाड़ी के अंदर झांका।

आरव बैठा था, लैपटॉप पर कुछ टाइप करते हुए। उसने ऊपर देखा, हल्के से सिर हिलाया।

अन्वी हिचकिचाई। "नहीं, ठीक है... बस आ जाएगी।"

लेकिन बारिश ने जैसे उसका मजाक उड़ाया – और तेज हो गई।

अन्वी अंदर बैठ गई।

पूरे रास्ते चुप्पी।

सिर्फ वाइपर की आवाज और बारिश की थाप।

अन्वी ने चुपके से उसे देखा – साफ-सुथरा चेहरा, थकी हुई आंखें, लेकिन कुछ ऐसा जो डराता नहीं था।

गाड़ी उसके घर के पास रुकी।

अन्वी ने दरवाजा खोला, फिर मुड़ी। "थैंक यू... अंकल।"

आरव का हाथ लैपटॉप पर रुक गया।

वो पहली बार हंसा – हल्के से, लेकिन सच में। "अंकल? मैं इतना बूढ़ा नहीं हूं।"

अन्वी शर्मा गई। "सॉरी... थैंक यू।"

वो भागकर घर में घुस गई।

आरव गाड़ी में बैठा रहा, मुस्कुराता रहा।

उसके बाद मुलाकातें जैसे इत्तेफाक बन गईं।

कभी कॉलेज के बाहर कॉफी शॉप पर – अन्वी अपनी सहेलियों के साथ, आरव अकेला। वो दूर से सिर हिलाता, अन्वी शर्मा कर नजरें चुरा लेती।

कभी वही बस स्टॉप – आरव की गाड़ी धीरे से रुकती, ड्राइवर छतरी लेकर उतरता। अन्वी मना करती, लेकिन बैठ जाती।

आरव कभी ज्यादा नहीं बोलता।

"कॉलेज कैसा चल रहा है?"

"ठीक।"

"एग्जाम हैं?"

"हां, अगले हफ्ते।"

बस। ना नंबर मांगा, ना ज्यादा सवाल।

अन्वी को अच्छा लगता – कोई उसे बच्चा नहीं समझता। बात करता जैसे बराबर का हो।

लेकिन मां ने देख लिया।

एक शाम अन्वी गाड़ी से उतर रही थी, मां बालकनी में खड़ी थीं।

रात को डिनर पर मां ने पूछा, "वो कौन था?"

अन्वी चुप रही।

"बोल अन्वी। वो आरव मल्होत्रा है ना? अखबारों में नाम आता है उसका। इतना बड़ा आदमी... हमारे जैसे लोगों से क्या मतलब?"

मां की आंखों में डर था। समाज का, बातों का, और उस फर्क का जो पैसे और पावर से आता है।

"मां, वो बस लिफ्ट देते हैं। कुछ नहीं।"

"दूर रह बेटी। ये लोग अच्छे नहीं होते। वो तेरी उम्र से दोगुना है। लोग क्या कहेंगे?"

अन्वी ने दूरी बना ली।

बस स्टॉप पर खड़ी रहती, लेकिन गाड़ी दिखते ही नजरें फेर लेती।

आरव समझ गया।

वो रुकता नहीं था अब।

कई हफ्ते बीत गए।

एक शाम, अन्वी घर लौट रही थी। दरवाजा खोला तो मां के सामने आरव बैठा था।

सूट में, हाथ में फूलों का गुलदस्ता नहीं – बस एक साधारण पेपर बैग, जिसमें अन्वी की पसंदीदा चॉकलेट थी।

मां हैरान। अन्वी की सांस रुक गई।

आरव ने मां से कहा, "आंटी, मैं ज्यादा नहीं बोलूंगा। मैं जानता हूं मैं कौन हूं, और आपकी बेटी कितनी अच्छी है। मैंने कभी उससे कुछ गलत नहीं कहा, न कहूंगा। वो पढ़ाई कर रही है, मैं इंतजार कर सकता हूं। जितना समय लगे। लेकिन मैं उसे कभी मजबूर नहीं करूंगा।"

मां चुप रहीं।

आरव ने अन्वी की तरफ देखा, "तुम्हारी मर्जी। मैं गया।"

वो उठकर चला गया।

समय बीता।

अन्वी ने पढ़ाई पर ध्यान दिया। कभी-कभी आरव की गाड़ी दूर से दिखती, लेकिन रुकती नहीं।

वो जानता था – दबाव नहीं डालना।

कॉलेज का आखिरी साल।

अन्वी अब इक्कीस की हो चुकी थी।

एक शाम वो खुद कॉफी शॉप पर गई, जहां आरव अक्सर बैठता था।

वो वहीं था, लैपटॉप पर।

अन्वी उसके सामने बैठ गई।

"हाय।"

आरव ने ऊपर देखा, चौंका। फिर मुस्कुराया। "हाय। कॉफी?"

"हां।"

चुप्पी के बाद अन्वी ने पूछा, "अब भी इंतजार कर रहे हो?"

आरव ने कॉफी का कप नीचे रखा। आंखों में देखकर कहा,

"नहीं। अब इंतजार नहीं। अब साथ चलने का समय है। अगर तुम चाहो तो।"

अन्वी मुस्कुराई।

उस मुस्कान में तीन साल की दूरी थी, समझ थी, और एक विश्वास।

वो कहानी न अचानक शुरू हुई थी, न जल्दबाजी में खत्म।

वो बनी थी – समय से, सम्मान से, और उस चुप्पी से जो शब्दों से ज्यादा बोलती है।

दिल्ली की भीड़ में दो लोग मिले थे – एक जो सब कुछ जीत चुका था, और एक जो अभी सपने बुन रही थी।

और उन्होंने फैसला किया – साथ चलने का।

धीरे-धीरे।

जैसे बारिश की पहली बूंदें गिरती हैं – बिना शोर के, लेकिन गहराई तक।

शायद सच्ची मोहब्बत ऐसी ही होती है।

ना ड्रामा, ना जल्दबाजी।

बस एक विश्वास कि सही समय पर सब सही हो जाएगा।

अगर ये कहानी आपके दिल को छू गई हो,

तो बताना – क्या आप को भी कभी ऐसा लगा कि कोई इंसान बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह जाता है?

या कोई रिश्ता जो समय की आंच में पककर और गहरा हो गया?

कमेंट में अपनी फीलिंग शेयर करे।

शायद आपकी कहानी भी किसी की प्रेरणा बन जाए।