Trisha - 26 in Hindi Women Focused by vrinda books and stories PDF | त्रिशा... - 26

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त्रिशा... - 26

जहां एक ओर त्रिशा तैयार होकर ब्यूटी पार्लर में बैठी थी वहीं यहां गेस्ट हाउस में राजन भी तैयार था और बारात के जाने का प्रोगाम शुरु हो चुका था। 

जैसे ही लड़के वालों ने अपना कार्यक्रम शुरु किया तभी कल्पेश‌ ने मानस को भेज कर त्रिशा को भी वहां बुला लिया और बारात के वहां पहुंचने से पहले ही त्रिशा को ऊपर के कमरे में घर की महिलाओं के बीच छोड़ दिया गया। 

अपने मन में लाखों उम्मीद लिए और आंखों में हजारों सपने सजाए त्रिशा वहां कमरे में बैठी थी। उसके पेट में बार बार घबराहट और नर्वसनेस के कारण गुड़गुड़ हो रही थी। आने वाला कल कैसा होगा??? उसका आने वाला जीवन कैसा होगा??? नए  लोग, नया घर, नए रिश्ते कैसे निभेगें उसके मन में यह सारे सवाल उठ रहे थे। क्या वो खुश रह पाएंगी ???? क्या वह अपने नए घर को अपना बना पाएंगी????? जहां अपने नए जीवन की उसे खुशी थी वहीं उसे इस बात का डर भी था कि क्या होगा, कैसे होगा और वो कैसे रह पाएंगी। 

नीचे से जोर जोर से बजने वाले ढ़ोल और बैंड की आवाज से त्रिशा अपनी सोच से बाहर आई। 
"बारात दरवाजे पर आ गई!!!!!!!!!" किसी के चिल्लाने की आवाज आई। 

"चलों चलों!!!!! जल्दी चलों बारात आ गई है!!!!!!" वहां मौजूद महिलाओं में शोर होने लगा और सभी एक एक कर उस कमरे से चले गए और अब वहां त्रिशा और महक के अलावा कुछ छोटे बच्चे और एक आधी महिलाएं ही रह गई थी जो कि जल्दी जल्दी खुद तैयार होने में लगी थी। 

अंदर कमरे की शांति से विपरीत बाहर बहुत शोर शराबे, नाचे गाने, ढ़ोल पटाखों के साथ बारात का आगमन हुआ और फिर पंरपरा के अनुसार बारात का और दूल्हे का स्वागत किया गया और दरवाजे की सारी रस्में निबटा कर राजन को जयमाल के स्टेज पर  बिठाया गया जहां वो और उसके कुछ भाई या दोस्त उसके साथ फोटो वगैराह लेने में लगे थे। 

तभी पंडित जी के कहने पर त्रिशा को नीचे बुलाया गया। कल्पना ने ऊपर जाकर यह बात त्रिशा को बताई और जैसे ही त्रिशा ने यह सुना उसकी घबराहट और बढ़ गई। बाहर से भले ही वह कितना भी समान्य रहने की कोशिश करें पर अंदर ही अंदर जज्बातों का  तूफान सा उठा पड़ा था। खैर फिर भी एक लंबी सांस लेकर त्रिशा खड़ी हुई और चलने लगी। महक और उसकी कुछ दूर की चचेरी बहनों ने त्रिशा का लंहगा पकड़ा ताकी उसे चलने में आसानी हो सके। 

घबराहट के कारण त्रिशा को ऐसा लग रहा था कि जैसे उसके हाथ पैर कांप रहे हो। वह अपने दोनों हाथों से कसकर अपने लंहगे को पकड़कर और लंबी लंबी सांसे भरते हुए नीचे की ओर उतरी और नीचे उसे उसके चारों भाई मानस, चेतन, मान और तन्मय उसके लिए फूलों कि चादर लिए मिलें। 

चारों भाईयों ने चादर के चार कोनों को पकड़ कर रखा हुआ था। तन्मय और मान क्योंकि हाईट में कुछ छोटे थे तो आगे की ओर खड़े थे, वहीं मानस और चेतन पीछे की ओर थे। त्रिशा ने अपने भाईयों को देखा आज के दिन के लिए चारों ने एक से ही सूट खरीदें थे और वहीं पहने थे। 

त्रिशा ने उन्हें देखा और वह भी अपनी बहन को देख उसके साथ हंसी ठिठोली करने लगे पर पहली बार त्रिशा के साथ ऐसा हुआ था कि उसके भाई उसे यूं छेड़ रहे थे और वो कोई जवाब नहीं दे रही थी। उल्टा इस बार वह भावुक हो उठी और उसकी आंखों में आसूं आ गए। शायद जीवन में आज पहली बार उसे समझ आया कि उसके चारों भाई जिनसे वो लड़ती झगड़ती थी वो उसके लिए कितने खास थे और उस लड़ाई झगड़े में भी कितना अपनापन और प्यार छिपा था। 

उसे यूं भावुक होता देखकर उसके भाईयों की आंखें भी नम हो  गई  क्योंकि शायद यहीं हाल‌ उनका भी था। पर तभी सुदेश‌ ने आकर‌ उनसे कहा," अरे चलों भई!!!!!" जल्दी करों!!!!!" " और यह क्या तुम लोगों ने शादी से पहले ही विदाई का माहौल बना लिया है!!!!!" " खुशी का मौका है, हंसते खेलते काम करों सारे!!!!! " "चलों अब जल्दी चलो!!!" और बेटा त्रिशा अभी से रोएगी तो जो तेरा इतना मंहगा मेकअप हुआ है ना सब खराब हो जाएगा!!!!" ऐसा रोता चेहरा लेकर जाएगी ना तो राजन डरकर ना भाग जाएं कहीं!!!"  

सुदेश की बात सुनकर सभी हंसने लगे और त्रिशा भी हंस दी। फिर  खुद को संभाल कर सभी लोग आगे बढ़े।  नाचे गाने, धूमधाम के बीच त्रिशा ने धीरे धीरे कदमों से स्टेज का रुख किया और वहां पहुंचते ही  त्रिशा के भाईयों ने उसपर हे चादर हटाई और फिर कुछ ही समय बाद पंडित जी के कहने पर दो थाल जिन पर फूलमाला रखी गई थी मंगवाएं गए। 

त्रिशा और राजन दोनों अपने अपने हाथों में लाल गुलाब की वरमाला लेकर खड़े हो गए क्योंकि फोटोग्राफर और विडियो ग्राफर फोटोस और विडियोज बनाने में व्यस्त थे।  खैर वो सब निबट जाने के बाद  दोनों ने सभी की तालियों की गड़गड़ाहट के बीच एक दूसरे के गले में वरमाला डाली।  और वहां खड़े त्रिशा के माता पिता नम आंखों से अपनी बेटी की शादी के इस सुखद अनुभव को महसूस करने लगे।  कहते है मां बाप के लिए बेटी की शादी बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है और यह समय केवल त्रिशा के लिए ही नहीं उसके माता पिता के लिए भी बड़ा कठिन था। क्योंकि जज्बातों का एक तूफान उनके मन में भी था। उन्हें जहां एक ओर इस शादी की खुशी थी वहीं डर भी था कि ना जाने अब उनकी बटी के भविष्य में क्या लिखा है। उन्होनें तो अपनी तरफ से अच्छा घर और लड़का ढूंढने की हर संभव कोशिश की है और शादी में भी अपनी हैसियत से बढ़कर सबकुछ किया है। अब बस उनकी बेटी सुखी रहे दोनों मन में यहीं प्रार्थना कर रहे है।