Trisha - 34 in Hindi Women Focused by vrinda books and stories PDF | त्रिशा... - 34

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त्रिशा... - 34

त्रिशा अपने ही अंदर  गूंज रही और आपस में एक दूसरे से लड़ रही उन दोनों आवाजों को सुन सुन कर और भी असमंजस में पड़ती जा रही थी। उसे समझ नहीं आ रहा कि वह क्या फैसला करे। वो राजन को जो उसने उसके साथ जानवरों सा सलूक किया उसके लिए माफ कर दे या नहीं????? त्रिशा काफी देर तक अपनी उलझन में उलझी रही पर उसे कुछ समझ नहीं आया। और सबसे बड़ी बात की राजन वहीं उसके पास बैठा ऐसे दोषी की तरह देख रहा है जिसे भरी अदालत अपनी सजा की सुनवाई का इंतजार हो।

वो एकटक त्रिशा को  देख रहा है। उसके चेहरे पर दुख, शर्मींदगी और चिंता के भाव है। और  उसके चेहरे के यह सभी भाव त्रिशा के गुस्से को कहीं ना कहीं  शांत कर रहा थे पर वो फिर भी राजन को माफ नहीं कर पा रही थी। हां वो पिघल जरूर रही थी पर उसके खुद के दिल के किसी कोने में कल रात की रात से उत्पन्न हुई कुंठा और गुस्सा उसे राजन को माफ नहीं करने दे रही थी। 


त्रिशा की चुप्पी देखकर राजन बोला," त्रिशा, कुछ तो बोलो????? कम से कम ऐसे चुप तो ना रहो!!!!  मुझसे लड़ो, मुझे सुनाओ, मुझसे झगड़ा करो पर मुझसे बोलो और इस बारे में बात कर के और मुझे माफ करके इस बात को हमेशा के लिए खत्म करो ताकि हम एक नई शुरुआत कर सके!!!!!!!" 

राजन की बात सुनकर त्रिशा ने कुछ सोचा और फिर बोली, " राजन जी!!!! मुझे इस बारे में सोचने के लिए वक्त चाहिए प्लीज!!!!!!!‌ कल रात आप भले ही नशे में थे इसलिए जो हुआ वो आप भूल सकते हो  पर मैं नशे में नहीं थी!!!!!!!! इसलिए आपने जो कुछ भी किया उसे मैं इतनी आसानी से नहीं भुला सकती हूं!!!!!!!!!!! आपने कल रात मेरा दिल, मेरा सपना, मेरा आत्म सम्मान सब तोड़ दिया है!!!!!!!! मैं कुछ भी समझ नहीं पा रही हूं इसलिए प्लीज मुझे वक्त दे!!!!!!!"  त्रिशा ने रुआंसे गले से अपनी बात राजन से कही। 

त्रिशा की बात सुनकर राजन को कुछ दुख सा हुआ पर वह कुछ ना बोला। वह खड़ा हुआ और बोला," जैसी  तुम्हारी मर्जी!!!!! तुम जितना चाहे वक्त ले सकती हो पर मैं फिर से एक बार तुमसे बस इतना कहना चाहता हूं कि मै मानता हूं कि कल मुझसे गलती हुई है पर मैने वो जानबूझ के नहीं किया और ना ही तुम्हें दुख या तकलीफ देने का मेरा कोई इरादा है। मै अपने बर्ताव के लिए हाथ जोड़ के माफी मांगता हूं और विनती करता हूं कि मुझे अपनी गलती सुधारने का एक मौका दो।।।।।" इतना‌ कहकर वह  कमरे से बाहर चला गया। और त्रिशा अपनी आंखों में आंसू लिए उसे जाते हुए देखती रही। 

वह अंदर से इस समय उलझी हुई, परेशान और दुखी है‌। कल‌ उसके साथ जो कुछ भी हुआ उसने उसे मानसिक और भावनात्मक रुप से हिला दिया है। वह दुखी है, वह गुस्से में है  पर फिर भी आज जब उसने पहली बार अपने लिए आवाज उठाई तो उसे कहीं ना कहीं अच्छा लग रहा है। आज तक वह हमेशा डरी घबराई रहती थी पर आज अपने मन की बात कह पाने की हिम्मत ना जाने उसमें कहां से आ गई  थी। शायद कल उसके साथ जो कुछ भी हुआ उसी ने उसमें इतनी हिम्मत ला दी थी। उसका राजन पर जो गुस्सा था वहीं आज उसे खुद के लिए बोलने की हिम्मत दे गया। 

त्रिशा ने अपने आंसू पोछे और फिर बिस्तर से खड़ी हुई। उसने अपना सूटकेस खोला और उसमें से कपड़े निकालकर बाथरुम में नहाने चली गई। बाथरुम में जाते ही त्रिशा ने शावर चालू किया और उसके नीचे खड़ी हो गई। शावर से गिरते ठंडा ठंडा पानी त्रिशा के चेहरे पर पड़ा तो उसे बड़ा अच्छा सा लगा। धीरे धीरे पानी  त्रिशा के चेहरे से होते हुए उसके पूरे शरीर को भीगाता रहा और त्रिशा वहीं खड़ी ऐसे ही भीगती रही। 

कुछ देर वहीं खड़ी रहने के बाद त्रिशा ने धीरे धीरे अपने हाथ से अपने शरीर पर साबुन लगाना शुरु किया लेकिन तभी उसने अपने शरीर पर जगह जगह पड़े नीले निशानों को देखा। जिसे देखकर उसके मन में टीस सी उठी। वह नहा ही रही थी कि तभी किसी ने उसके बाथरुम के दरवाजे पर आकर दस्तक दी। त्रिशा को पहले तो लगा कि राजन है  इसलिए वह अपने गुस्से के कारण कुछ ना बोली। 

"त्रिशा बेटा तुम अंदर हो क्या????" बाथरुम के बाहर खड़ी राजन की मां ने त्रिशा को आवाज देते हुए कहा। 

अपनी सास की आवाज सुनकर त्रिशा कुछ शांत हुई और बोली," जी मम्मी जी!!!!!!" 

"बेटा, थोड़ा जल्दी से तैयार हो जाओ। आज तुम्हें देखने सब आ रहे है‌ ना। मुंह दिखाई जो है आज तुम्हारी।" त्रिशा की सास ने कहा। 

" जी ठीक मम्मी जी!!!!!!!" त्रिशा ने जवाब दिया। 

"अच्छा सुनो त्रिशा, बेटा तुम्हारे लिए साड़ी निकाल दी है मैनें । बाहर आकर यही पहन लेना!!!!!" बाहर से राजन की मां ने कहा। 

"जी ठीक!!!!!"  अंदर से त्रिशा बोली और फिर उसके बाद राजन की मां कमरे से बाहर चली गई। उनके जाने के बाद त्रिशा भी जल्दी से अपनी सारी उलझन सारी बातें अपने आप में समेट कर जल्दी से  नहाकर बाहर  आ गई। 


बाहर आकर त्रिशा ने बैड पर रखी साड़ी उठाई और अपनी  मुंह दिखाई की रस्म के लिए तैयार होने लगी। आज के लिए त्रिशा ने पीले रंग की साड़ी पहनी थी जिसके साथ लाल रंग का ब्लाउज है जो कोहनी तक का है। पूरी साड़ी पीली ही रंग की है जिसपर सिल्वर रंग का बार्डर है। उसके लाल ब्लाउज के बार्डर पर‌ भी सिल्वर रंग का बार्डर है।  दोनों , साड़ी और ब्लाउज पर सिल्वर रंग का छोटे छोटे फूल की  कढ़ाई है। यह रंग भी त्रिशा पर खूब फब रहा है। 

त्रिशा ने अपने बालों का जूड़ा बनाया और साड़ी के साथ अपनी सास की निकाली हुई ज्वैलरी में से पहले  कानों में झुमकी पहनी, फिर गले में हार पहना, उसके बाद सामने रखी सिंदूर की डिब्बी से त्रिशा अपने लिए सिंदूर निकालने लगी लेकिन अपनी मांग में भरे उस सिंदूर को, अपने गले के मंगलसूत्र को, अपने हाथों की चुड़ियों और हथेली की मेहंदी देखकर त्रिशा को एकाएक राजन की और कल रात की घटना की याद आ गई।

वो पति जिसके नाम से वो इतना सज संवर रही है कल रात वही उसका पति उसके साथ इतनी बदसलूकी कर रहा था। "क्या ऐसे पति को माफ कर देना चाहिए????? क्या ऐसे पति के साथ वो अपना पूरा जीवन बिता पाएंगी????? क्या भरोसा है इस बात का की जो कल हुआ वो फिर कभी दोबारा नहीं होगा????? इसलिए बेहतर यही होगा कि वो राजन को माफ ना करे और वापस अपने पिता के घर चली जाए।।।। उसके पिता उसका बहुत लाड़ करते है और अगर वो उन्हें बोलेगी कि वो यहां खुश नहीं है तो वो उसे जबरदस्ती यहां नहीं भेजेंगे।।।।। हां यही सही रहेगा।।।।। उसका अपने पिता के घर जाना ही सही रहेगा।।।।।" त्रिशा ने मन ही मन विचार कर निर्णय लिया।