Trisha - 36 in Hindi Women Focused by vrinda books and stories PDF | त्रिशा... - 36

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त्रिशा... - 36

राजन ने जब खाने का निवाला यूं चेहरे पर मुस्कान और आंखों में प्यार के साथ त्रिशा की ओर बढ़ाया तो त्रिशा एक पल  को सोच में पड़ गई क्योंकि कल के बाद उसे राजन से ऐसे व्यवहार की उम्मीद ना थी। 

त्रिशा को ऐसे चुपचाप उसे देखते हुए राजन ने फिर से एक बार वो निवाला त्रिशा की ओर बढ़ाते हुए कहा," त्रिशा यार कल जो हुआ मैं उसे बदल नहीं सकता पर अब ऐसा नहीं होगा इस बात का आश्वासन जरुर दे सकता हूं!!!!!!! इसलिए अब कल की बात से दुखी होना‌ छोड़ो और खाना खा लो प्लीज।।।।" 

त्रिशा इस बार भी चुप थी। वह राजन की सारी बाते सुन रही थी और उसे सुनकर अच्छा भी लग रहा था कि राजन को अपने किए पर दुख है और वह उसके लिए माफी भी मांग रहा है। वो सुबह से उसे मना भी रहा है पर फिर भी वह कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रही थी। बस अपनी मोटी मोटी भूरी आंखों से बिना पलक झपकाएं उसे देख रही थी। 

इतना कहने के बाद राजन‌ ने त्रिशा से एक भी शब्द और ना कहा बस उसके हाथ में जो निवाला था वो त्रिशा की ओर बढ़ा कर अपनी आंखों से प्यार से उसे खाने का इशारा किया। त्रिशा, जिसका मन कल रात की घटना से बहुत आहत और दुखी था उसे अब काफी अच्छा लग रहा था और कहीं ना कहीं अब उसके दिल को सुकुन भी मिला। उसने अपने अंदर के दुख और गुस्से को दबा कर आखिरकार एक नई शुरुआत का फैसला किया और फिर वो निवाला खा लिया। 

त्रिशा को खाना खाता देख राजन ने राहत की सांस ली और त्रिशा को देखकर बहुत प्यार भरी एक हल्की  सी  मुस्कान दी और फिर दूसरा निवाला त्रिशा को खिलाया। राजन को इतने प्यार से अपना ध्यान रखता देख त्रिशा का मन भर आया और खाना उसके गले में अटक गया और उसे खांसी शुरु हो गई। 

उसे खांसता देख राजन‌ ने तुंरत प्लेट साईड में रखकर पानी का गिलास त्रिशा को पकड़ाते हुए उसे पानी पीने को कहा और फिर खुद उसकी पीठ सहलाने लगा। पानी पीने के बाद त्रिशा को कुछ आराम सा मिला और उसकी खांसी बंद हो गई लेकिन उसकी आंखे अभी भी नम थी। उनमें आंसू भरे बैठे थे जो कभी भी बांध तोड़कर बहने को तैयार थे। 

त्रिशा की आंखों में आए पानी को देख राजन ने चिंतित होकर पूछा," क्या हुआ त्रिशा???? तुम रो क्यो रही हो???? सब ठीक है ना?????" 

त्रिशा ने अपना सिर हां में हिलाते हुए कहा," हम्ममम ठीक हूं मैं!!!!!!" 

"अगर तुम ठीक हो तो फिर तुम्हारी इन झील सी आंखों में यह बाढ़ क्यों आ रही है?????" राजन ने फिर से खाने का एक निवाला त्रिशा खिलाते हुए पूछा। 

"नहीं तो!!!!!" त्रिशा ने खाते खाते धीमी आवाज में कहा। 

"अच्छा ऐसा क्या????? फिर तो‌ मुझे लगता है कि शायद मेरी आंखे खराब हो गई है तभी तो मुझे तुम्हारी आंखों में यह मोती से आंसू दिखाई दे रहे है।।।"  राजन ने हंसते हुए कहा। 

त्रिशा ने राजन‌ की बात सुनी‌ पर फिर भी चुप रही और खाना खाती रही। उसे चुप देखकर राजन ने खाने का अगला निवाला उसे खिलाते हुए कहा," त्रिशा, जो तुम्हारे अंदर है उसे कह दो अच्छा लगेगा तुम्हें! और वैसे भी तुम अपने मन की मुझसे नहीं कहोगी तो किससे कहोगी!!!!!" 

राजन कि बात सुनकर त्रिशा को और भी अच्छा लगा। उसका वो विश्वास जो कल रात टूट सा गया था धीरे से फिर बढ़ने लगा। त्रिशा ने बहुत साहस करके हिम्मत करके धीमी सी आवाज में कहा,
" कल रात जो हुआ उससे मैं डर गई थी। कल रात मुझे ऐसा लगा कि जैसे अपने भविष्य को लेकर मेरे जितने सपने, जितनी उम्मीदें थी सब एक पल में, एक झटके में टूट गई हो।" इतना कहते कहते त्रिशा की आंखों में ठहरे आंसू धीरे से सरक कर बहने लगे। 


राजन ने बड़े प्यार से त्रिशा के आंसू पोंछते हुए उसकी आंखों में आंखे डालकर कहा," हमारा भविष्य साथ में बहुत सुंदर है!!!! बहुत प्यारा है!!!!! और तुम्हारे सपने और तुम्हारा दिल मैं कभी टूटने नहीं दूंगा!!!!!!!यह वादा है मेरा तुमसे!!!!! "   

राजन की बात से त्रिशा के आंसू रुक गए और वो भी मुस्कुरा दी। उसे मुस्कुराता देखकर राजन अगला निवाला त्रिशा को खिलाते हुए बोला," चलो कम से कम तुम हंसी तो!!!! तुम नहीं जानती तुम्हें उदास देखकर मुझे कितना बुरा लग रहा था।।।।।" 

राजन की बाते सुनते सुनते त्रिशा ने टेबल पर रखी दूसरी प्लेट को उठाया और इस बार त्रिशा ने उस प्लेट से खुद एक रोटी का  टूक  लिया और उसमें सब्जी लगा कर, अपने हाथों से राजन की ओर बढ़ाया जिसे राजन ने भी बड़े प्यार से खा लिया। और इस तरह सारी कड़वी बात भुला कर दोनों के बीच सब ठीक हो गया। दोनों ने एक दूसरे को अपने हाथों से खाना खिलाया और फिर दोनों एक दूसरे के गले लग, एक दूसरे की बाहों में अपने प्यार को जीवांत कर और अपने रिश्ते में आई उस कड़वी याद को मिटा, एक अच्छी नई  और सुखद याद बनाते हुए और सुख और प्यार के पलों को जीने के बाद आराम से, चैन से, सुकुन से सो गए। उस रात उन दोनों में सब कुछ ठीक हो गया और असल मायनों में उनके सुखी वैवाहिक जीवन की शुरुआत हो चुकी थी। कम से कम अभी के लिए त्रिशा को यही लगता था‌।