Khamosh jindagi ke bolate jajbat - 9 in Hindi Love Stories by Babul haq ansari books and stories PDF | खामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात - 9

Featured Books
Categories
Share

खामोश ज़िंदगी के बोलते जज़्बात - 9

                           भाग:9.   

                   रचना:बाबुल हक़ अंसारी

                   "आख़िरी मंच का सच…"



पिछले खंड से…

  "सच की सबसे बड़ी ताकत यही है… कि चाहे कितनी भी देर से आए, वो अपना रास्ता खुद बना लेता है।"


आश्रम की शाम…
आचार्य शंकरनंद की बांसुरी की धुन जैसे हर आत्मा को छूकर गुज़री।
लेकिन उस धुन के बाद आई खामोशी, जैसे किसी तूफ़ान का इशारा थी।

गुरु ने धीमे स्वर में कहा —
"अब वक्त है कि मैं वो राज़ खोल दूँ… जिसने तुम्हें, आर्या को और रघुवीर त्रिपाठी को एक ही डोर में बाँध रखा है।"

अनया चौंकी।
"मेरे पापा को? उनसे आपका क्या रिश्ता…?"

गुरु की आँखें गहरी हो गईं।
"रिश्ता… वो जो कभी बोला नहीं गया।
रघुवीर त्रिपाठी सिर्फ़ तुम्हारे पिता ही नहीं थे, अनया।
वो मेरे भी… शिष्य थे।
और उनकी हार, उनकी जिद… दरअसल मेरी अधूरी सिखलाई का परिणाम थी।"


नीरव ने चौंककर कहा,
"गुरुजी! ये सच आपने आज तक क्यों छुपाया?"

गुरु का स्वर भारी था,
"क्योंकि सच अगर समय से पहले उजागर हो जाए, तो रिश्तों को तोड़ देता है।
लेकिन आज… वक्त आ गया है।
वो ‘आख़िरी मंच’ अब तैयार है — जहाँ तुम सबको अपने-अपने सच का सामना करना होगा।"


अचानक आश्रम के बाहर से ढोल-नगाड़ों की आवाज़ आई।
आर्या खिड़की तक दौड़ी और देखा —
गाँव में एक बड़ा साहित्यिक सम्मेलन शुरू होने वाला था।
मंच वही था, जहाँ रघुवीर त्रिपाठी की आख़िरी हार हुई थी।

अनया का दिल जोर-जोर से धड़कने लगा।
"क्या… हमें वहीं जाना होगा?"

गुरु ने मुस्कुराकर कहा,
"हाँ, अनया।
यही नियति है।
वहीं तुम्हारे पिता की आत्मा को भी शांति मिलेगी… और तुम सबको अपनी पहचान।"


उस रात तीनों ने एक ही आँगन में बैठकर लंबी खामोशी साझा की।
फिर नीरव ने कलम उठाई और बोला —
"कल इस मंच पर, मैं कोई कविता नहीं पढ़ूँगा।
मैं अपनी अधूरी सच्चाई सुनाऊँगा।
और अगर लोग मुझे ठुकराएँगे… तो भी मैं भागूँगा नहीं।"

अनया ने उसके शब्दों पर गहरी नज़र डाली।
पहली बार उसके चेहरे पर भरोसे की झलक थी।

आर्या ने हाथ जोड़ते हुए कहा,
"तो तय रहा… कल, वही होगा जो किस्मत ने लिखा है।
चाहे आँसू बहें, चाहे तालियाँ गूंजें — सच अब छुपेगा नहीं।"


अगली सुबह…

गाँव का चौराहा जगमगा उठा था।
रंग-बिरंगे झंडे, चमकती रोशनी और ऊँचे मंच पर लगी बड़ी तस्वीर — रघुवीर त्रिपाठी की।
लोग उमड़कर आए थे… कुछ श्रद्धांजलि के लिए, कुछ जिज्ञासा में, और कुछ तमाशा देखने।

ढोल-नगाड़ों की थाप के बीच उद्घोषक ने घोषणा की —
"आज इस मंच पर, वो सच सुना जाएगा… जिसे सालों से दबा दिया गया।
आज की शाम सिर्फ़ साहित्य की नहीं… आत्मा की होगी।"


भीड़ के बीच से नीरव, अनया और आर्या गुरु शंकरनंद के साथ मंच की ओर बढ़े।
लोगों की नज़रें उन पर थीं —
कुछ में सम्मान, कुछ में शक, और कुछ में उपहास।

अनया की सांसें तेज़ थीं।
उसने धीमे स्वर में नीरव से कहा,
"अगर लोग तुम्हें ठुकराएँ तो?"

नीरव ने गहरी साँस ली,
"तो ये ठुकराव मेरी मुक्ति होगा।
क्योंकि मैं अब और भागना नहीं चाहता।"


मंच पर पहुँचे तो गुरु शंकरनंद ने हाथ उठाकर भीड़ को शांत किया।
"आज, ये मंच किसी एक की जीत या हार का नहीं है।
ये मंच है उस सच का, जो हम सबको जोड़ता है।"

फिर उन्होंने इशारा किया — नीरव को आगे बढ़ने के लिए।


नीरव ने माइक पकड़ा।
उसकी आवाज़ कांपी, लेकिन आँखें दृढ़ थीं।

"मैं नीरव हूँ… वो इंसान, जिसने कभी रघुवीर त्रिपाठी को हराया था।
लेकिन सच ये है… कि वो जीत मेरी नहीं थी।
वो जीत एक झूठ की छाँव में खड़ी थी।"

भीड़ सन्न रह गई।
कुछ कानाफूसी करने लगे।

नीरव ने आगे कहा —
"हाँ, मैं मानता हूँ कि त्रिपाठी जी महान कवि थे।
लेकिन वक्त, हालात और मेरी खामोशी ने उन्हें हारने पर मजबूर किया।
और ये अपराध मैं अपनी आत्मा में रोज़ ढोता रहा हूँ।"


आर्या की आँखों में आँसू भर आए।
अनया का दिल टूटते-टूटते संभल गया।

भीड़ से आवाज़ें उठीं —
"तो अब सच क्या है?"
"क्या त्रिपाठी जी हार के हकदार नहीं थे?"
"किसने तय किया, किसे जीतना चाहिए?"


नीरव का स्वर और मजबूत हो गया।
"सच ये है… कि कोई जीत-हार मायने नहीं रखती।
मायने रखता है वो शब्द, जो दिल को छू लें।
और आज… मैं उन अधूरे शब्दों को पूरा करना चाहता हूँ।"

उसने जेब से पुरानी डायरी का एक पन्ना निकाला।
"ये पन्ना रघुवीर त्रिपाठी का लिखा है।
लेकिन अधूरा रह गया।
आज मैं इसे पढ़ूँगा… और आप सब गवाह होंगे कि ये उनकी हार नहीं… उनकी अमरता है।"


नीरव ने पढ़ना शुरू किया —
शब्द जैसे हवा में घुल गए, भीड़ खामोश हो गई।
कहीं दूर ढोल की थाप थम गई।
हर आँख भीगने लगी।

पढ़ते-पढ़ते नीरव रुक गया।
अनया मंच पर आई, उसने पन्ना थामा और कहा —
"ये मेरे पापा की आख़िरी लिखाई है।
और आज… मैं इसे आगे लिखूँगी।
क्योंकि अब नफ़रत की जगह… सिर्फ़ प्यार और इज़्ज़त को मिलना चाहिए।"


भीड़ तालियों से गूँज उठी।
कुछ लोग रो पड़े।
गाँव का चौराहा जैसे पहली बार जज़्बातों से भर गया।

गुरु शंकरनंद ने आह भरते हुए कहा —
"लो, सच ने अपना रास्ता बना लिया।
अब ये मंच किसी का नहीं… सबका है।"


(जारी रहेगा… )