⭐ एपिसोड 65 — “किस्मत का दर्पण और मरता हुआ सत्य”
कहानी — अधूरी किताब
कमरा धुएँ और ठंड की धड़कती हुई परतों से भर चुका था।
अधूरी किताब का पन्ना अपनी जगह थम गया था, मानो उसने वो सब कह दिया था
जो सदियों से दफन था।
लेकिन हवेली शांत नहीं हुई—
वो और ज़्यादा बेचैन हो चुकी थी।
निहारिका ज़मीन पर बैठी थी,
उसके काँधे का लाल निशान अब किसी जलते अंगारे जैसा था।
जैसे उसकी हर साँस हवेली की नसों को छू रही हो।
अभिराज उसके पास आया और धीरे से बोला—
"उठो निहारिका…
तुम्हें दर्द में देखना मुझे अच्छा नहीं लगता।"
उसकी आवाज़ में पहली बार डर था,
और निहारिका ने वो डर महसूस भी किया।
सिया और आर्यन दोनों चुप थे।
सब जानते थे—
अब कुछ बड़ा होने वाला है।
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🔥 हवेली का बदलता चेहरा
अचानक दीवारों पर लगी पुरानी पेंटिंग्स कांपीं।
एक-एक करके सभी पेंटिंग्स के चेहरे बदलने लगे—
किसी की आँखें खाली,
किसी की मुस्कान गायब,
किसी के होंठ सीले हुए…
और सबसे डरावनी बात—
हर चेहरा धीरे-धीरे निहारिका जैसा बनने लगा।
सिया हड़बड़ा गई—
“ये… ये क्या हो रहा है?”
आर्यन बुदबुदाया—
“हवेली वारिस की पहचान हर कोने में बसा देना चाहती है।”
निहारिका खड़ी हुई, पर उसके पैर काँप रहे थे।
"मैंने आखिर क्या किया है जो ये सब मेरे साथ हो रहा है?"
अभिराज ने उसका हाथ पकड़ा।
"तुमने कुछ नहीं किया…
शायद तुम्हें बस अपनी सच्चाई से मिलना था।"
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🩸 किताब का छुपा हुआ पन्ना
अचानक हवाएँ तेज़ हो गईं।
अधूरी किताब फिर उठी—
लेकिन इस बार एक पन्ना फटा और कमरे के कोने में जा गिरा।
आर्यन दौड़कर उसे उठा लाया।
उस पर सिर्फ एक ही वाक्य लिखा था—
“सच दर्पण के पीछे दफन है।”
सिया ने जल्दी से पूछा—
“यानी हवेली का दर्पण?
वही जिसमें पहली वारिस की बहन दिखी थी?”
अभिराज ने हाँ में सिर हिलाया।
"पर अब उस दर्पण तक पहुँचना आसान नहीं होगा।
हवेली उसे बचा कर रखेगी… जान देकर भी।"
निहारिका की सांसें भारी हो गईं—
“अगर वहाँ मेरा सच है…
तो मुझे वहाँ जाना ही होगा।”
उसकी आवाज़ डर और हिम्मत दोनों से भरी थी।
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🌑 दर्पण तक का रास्ता जाग गया
जैसे ही निहारिका ने दर्पण का नाम लिया,
हवेली की मंज़िल से एक गहरी गुर्राहट जैसी आवाज़ आई।
सीढ़ियों की सीढ़ियाँ खुद-ब-खुद हिलने लगीं।
आर्यन बोल उठा—
“उधर मत जाना! ये हवेली किसी को भी जिंदा वापस नहीं आने देती।”
सिया ने डरते हुए कहा—
“नीचे का तहखाना… वही जहां पहली वारिस की बहन को मार कर दफन किया गया था…
शायद रास्ता वहीं से होकर जाता हो।”
निहारिका ने धीरे से कहा—
“अगर मेरी किस्मत का जवाब वहीं है…
तो मैं भाग कर नहीं जी सकती।”
अभिराज ने उसकी तरफ देखा—
उसकी आँखों में गर्व और बेचैनी दोनों थे।
“मैं तुम्हारे साथ हूँ।
लेकिन अगर हवेली ने तुम पर हमला किया तो…?”
निहारिका ने हल्की मुस्कान दी—
“तुम मुझे बचा लोगे।”
अभिराज का दिल तेज़ धड़कने लगा।
उसने कभी किसी को इस तरह देखने से खुद को रोका था—
पर आज… निहारिका उसके अंदर गहराई तक उतर चुकी थी।
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🪞 तहखाना— मौत की सांसें
चारों नीचे उतरे।
तहखाने की हवा पहले से भी ठंडी थी,
जैसे हजारों आत्माएँ एक साथ सांस ले रही हों।
दीवारों पर लाल खून की पतली-सी लकीरें थीं।
सबने देखा—
वो लकीरें निहारिका के पास आते ही चमक उठीं।
अभिराज ने घबराकर कहा—
“ये तुम्हारे खून को पहचानती हैं…”
निहारिका ने धीमे से पूछा—
“और मुझे कहाँ ले जाना चाहती हैं?”
दीवारों पर बनी लकीरें अचानक एक तरफ खिंचने लगीं,
जैसे किसी ने उन्हें पकड़कर खींचा हो।
और एक छुपा हुआ रास्ता उभर आया।
आर्यन चौंक गया—
“ये… ये रास्ता कभी नहीं दिखा!”
सिया ने फुसफुसाते हुए कहा—
“ये सिर्फ वारिस के लिए खुलता है…”
निहारिका ने एक गहरी सांस ली।
“तो चलो—
मेरे सच की ओर।”
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🌘 किस्मत का दर्पण आखिर सामने
तीनों के पीछे रास्ता खुद-ब-खुद बंद होने लगा,
जैसे हवेली उन्हें कैद कर रही हो।
रास्ते के अंत में एक बड़ा कमरा था।
बीच में एक प्राचीन दर्पण,
जिस पर लाल निशान और टूटी हुई लकीरें थीं।
पर जैसे ही निहारिका उसके पास पहुँची—
दर्पण खुद-ब-खुद चमक उठा।
फिर…
दर्पण में निहारिका नहीं,
बल्कि वही लड़की दिखाई दी—
पहली वारिस की बहन।
उसी का चेहरा,
उसी की आँखें…
लेकिन इस बार वो रो नहीं रही थी।
वो मुस्कुरा रही थी।
सीधे निहारिका को देखते हुए।
निहारिका का दिल रुक गया—
“तुम… मेरी कौन हो?”
दर्पण पर लाल रोशनी झिलमिलाई।
लड़की के होंठ हिले—
लेकिन आवाज़ नहीं आई।
अचानक दर्पण पर शब्द उभर आए—
**“खून एक है।
पर किस्मत अधूरी।”**
अभिराज ने उसका हाथ थाम लिया।
“निहारिका… ये तुम्हें बुला रही है।
कुछ चाहती है तुमसे।”
निहारिका ने कंपकँपाते हुए पूछा—
“क्या?
मुझसे आखिर क्या चाहिए?”
दर्पण के भीतर की लड़की ने अपनी कलाई काटी—
खून टपका,
और दर्पण पर नई पंक्ति बनी—
**“मेरी मौत का सच पूरा करो।
तभी हवेली तुम्हें जीने देगी।”**
चारों के चेहरे पीले पड़ गए।
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