Adhuri Kitaab - 66 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधुरी खिताब - 66

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अधुरी खिताब - 66

⭐ एपिसोड 66 — “दर्पण की खामोश चीखें”


कहानी — अधूरी किताब


तहखाने का कमरा दर्पण की लाल रोशनी से पूरी तरह घिर चुका था।

हवा इतनी ठंडी हो गई थी कि सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था।

निहारिका दर्पण के बिल्कुल सामने खड़ी थी—

उसकी आँखों में डर नहीं…

बल्कि एक फैसला साफ़ दिखाई दे रहा था।


दर्पण में वही लड़की…

पहली वारिस की बहन—

अब धीरे-धीरे अपनी उंगलियाँ निहारिका की ओर बढ़ा रही थी।

जैसे दोनों के बीच सदियों का रिश्ता अब पूरा होने वाला हो।


अभिराज तुरंत निहारिका के पास आकर बोला—


“ज्यादा पास मत जाना!

ये दर्पण तुम्हें निगल भी सकता है!”


निहारिका धीरे से बोली—


“अगर मेरा सच इसके भीतर है…

तो मुझे जाना होगा, अभिराज।”


अभिराज ने उसका हाथ अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया।


“अगर तुम्हें कुछ हुआ तो…

मैं खुद को कभी माफ़ नहीं करूँगा।”


निहारिका के दिल में एक अजीब सी गर्माहट उठी।

लेकिन इससे पहले कि वह कुछ कह पाती—

दर्पण पर नए शब्द उभरे—


“वारिस अकेली नहीं जाती।”


सिया ने घबराकर पूछा—


“मतलब?

क्या दर्पण हमें भी अंदर खींच लेगा?”


आर्यन ने कहा—


“शायद उसे गवाह चाहिए।

क्योंकि सच… अकेले नहीं देखा जाता।”



---


🪞 दर्पण ने रास्ता खोला


दर्पण पर दरारें हिलने लगीं।

उसमें से धुआँ निकला,

और एक अंधेरे सुरंग जैसा रास्ता दिखाई देने लगा।


निहारिका ने एक गहरी सांस ली।

उसने दर्पण की सतह पर हाथ रखा।


एक ठंडी बिजली उसके पूरे शरीर में दौड़ गई।


अभिराज ने तुरंत उसका दूसरा हाथ पकड़ लिया—

लेकिन निहारिका मुस्कुराई।


“डरो मत।

मैं कहीं नहीं जाऊँगी… जब तक सच न मिल जाए।”


दर्पण की सतह नरम हो गई—

जैसे पानी हो।


निहारिका अंदर खिंचने लगी।


“निहारिका!”

अभिराज ने चिल्लाकर उसे पकड़ा।


सिया और आर्यन भी दौड़कर उसकी बाँहें पकड़ लेते हैं।


कुछ ही सेकंड में—

चारों दर्पण के भीतर घुसते चले गए।



---


🌑 दर्पण के भीतर की दुनिया


अंधेरा।

सिर्फ अंधेरा।


लेकिन कुछ पलों बाद

हल्की रोशनी उभरने लगी।


चारों ने खुद को एक पुराने महल के बीच खड़ा पाया—

सदियों पुराना, लेकिन दर्पण जैसा साफ़।


सिया ने चारों ओर देखते हुए कहा—


“ये… हवेली का दूसरा रूप है क्या?”


अभिराज धीरे से बोला—


“ये हवेली नहीं…

हवेली की यादें हैं।”


अचानक सामने कुछ परछाइयाँ उभरीं—

लड़के और लड़की की आकृति।


दोनों भाई-बहन थे।

पहली वारिस… और उसकी बहन।


लड़की रो रही थी।

लड़का गुस्से में था।


लड़की —

“भैया मत करो!

मेरा खून… हवेली को अपवित्र कर देगा!”


लड़का —

“हवेली के राज मेरे हैं!

सिर्फ मेरे!”


अभिराज ने फुसफुसाया—


“ये वही रात है… जब उसे मारा गया था।”


निहारिका की आँखें भर आईं।

वह उस लड़की को देख रही थी—

जैसे अपने अतीत का टुकड़ा देख रही हो।



---


⚔️ सदियों पुरानी हत्या


लड़का आगे बढ़ा।

उसके हाथ में एक तीखा, चमकता खंजर था।


लड़की पीछे हटते हुए बोली—


“भैया… मैं तुम्हारी अपनी हूँ।”


पर लड़के के चेहरे पर हवेली की लाल चमक उतरती जा रही थी—

वह अब भाई नहीं… श्राप का गुलाम बन चुका था।


खंजर उसके हाथ से निकला—

और लड़की की छाती में धँस गया।


निहारिका चीख पड़ी—

जैसे दर्द उसके अपने शरीर में उतर गया हो।


सिया ने उसे थाम लिया।


आर्यन ने काँपते हुए कहा—


“हवेली ने भाई को बहन का हत्यारा बनाया था…

ताकि उसका खून हवेली को और शक्तिशाली बना दे।”


अभिराज ने आँखें बंद कर लीं—


“और वही खून अब निहारिका में है…”



---


🩸 लड़की की आत्मा सामने आई


मृत लड़की की आत्मा अचानक चारों के सामने प्रकट हुई—

लंबे बाल, सफेद चेहरा,

पर आँखें निहारिका जैसी गहरी।


वह सीधे निहारिका के सामने आकर रुकी।


निहारिका ने काँपते हुए कहा—


“क्यों बुलाया मुझे?”


लड़की की आवाज़ सिर्फ उसके मन में गूँजी—


**“क्योंकि तू ही मेरे खून की आखिरी साँस है।


मेरा सच पूरा कर…

तभी तुझे जीवन मिलेगा।”**


निहारिका रो पड़ी—


“मैं कैसे पूरा करूँ?”


लड़की ने अपनी छाती पर हाथ रखा—

जहाँ खंजर घुसा था।


फिर दर्पण के भीतर शब्द उभरे—


“मेरी मौत का दोषी अब भी जिंदा है।”


अभिराज की सांस अटक गई।


सिया चौक गई।


आर्यन भी स्तब्ध रह गया।


निहारिका ने हकलाते हुए पूछा—


“ज-जिंदा…?

पर ये तो सदियों पुरानी बात है…”


लड़की ने अपना हाथ आगे बढ़ाया—

उसका स्पर्श निहारिका तक आया,

जैसे कोई छाया उसे छू रही हो।


और उसके पीछे शब्द उभरे—


**“वह मर नहीं सकता।


वह हवेली में ही जिंदा है…

एक छाया की तरह।”**


दीवारें दहल उठीं।


अभिराज बुदबुदाया—


“मतलब… वह भाई… आज भी हवेली में है?”


निहारिका की आँखें फैल गईं।


लड़की की आत्मा ने अंतिम शब्द कहे—


**“उसे ढूँढो… और खत्म करो।


तभी हम दोनों की अधूरी किस्मत पूरी होगी।”**


कमरा जोर से हिलने

लगा—

दर्पण के भीतर की दुनिया टूटने लगी।


दर्पण की सतह फटने लगी—

वे चारों वापस बाहर की ओर खिंचने लगे।


निहारिका चीख उठी—


“मैं वादा करती हूँ…

मैं तुम्हारा सच पूरा करूँगी!”


और अगले ही पल—

चारों दर्पण के बाहर तहखाने में आ गिरे।