⭐ एपिसोड 67 — “हवेली का ज़िंदा साया”
कहानी — अधूरी किताब
तहखाने में अचानक सब कुछ शांत हो चुका था।
दर्पण सामान्य दिखाई दे रहा था—
जैसे कुछ हुआ ही न हो।
लेकिन निहारिका की साँसें तेज थीं,
दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि अभिराज ने तुरंत उसका हाथ पकड़ लिया।
“निहारिका… तुम ठीक हो?”
निहारिका ने धीरे-धीरे सिर हिलाया,
लेकिन उसके चेहरे पर सदियों का दर्द उतर आया था।
“वो लड़की… उसकी आँखों में जो दर्द था, अभिराज…
उसने मुझे सब दिखा दिया।”
सिया ने डरते हुए कहा—
“मतलब… सच यही है कि उसका भाई अब भी जिंदा है?
छाया बनकर?”
आर्यन बोला—
“छाया भले हो, पर ज़िंदा होना… ये सबसे डरावना है।”
निहारिका ने दर्पण की तरफ देखा।
सतह बिल्कुल शांत थी—
लेकिन भीतर एक चीख दबी हुई महसूस हो रही थी।
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🕯️ तहखाने की हवा अचानक बदल गई
चारों ऊपर जाने लगे।
लेकिन जैसे ही सीढ़ियों पर कदम रखा,
तहखाने की हवा में एक ठंडी लहर उठी।
हवेली की दिवारों पर हल्की खरोंचें उभरने लगीं।
“ये अभी था क्या?”
सिया पीछे हट गई।
अभिराज ने सबको आगे बढ़ाया—
“सावधान रहो।
तहखाना हमेशा से हवेली की धड़कन रहा है।”
निहारिका ने दिवार को छुआ—
सतह ठंडी थी,
लेकिन जैसे किसी ने अंदर से उँगलियाँ फेर दी हों।
“वह हमें देख रहा है…”
उसने धीमे से कहा।
आर्यन और सिया दोनों एक कदम पीछे हट गए।
अभिराज ने गहरी सांस ली—
“तो मिलेंगे उससे।
छुपने दो मत।”
लेकिन निहारिका ने सिर हिलाया—
“अगर वह सदियों से जिंदा है…
तो वह इंसान नहीं, साया है।
और साया सिर्फ डर से ताकतवर होता है।”
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🌑 हवेली की रात और भी भारी लगने लगी
जब चारों ऊपर पहुंचे तो हवेली के गलियारे बेहद खामोश थे।
इतने शांत…
जैसे किसी ने समय रोक दिया हो।
हवा में धूल तैर रही थी।
लालटेनें धीमी हो रही थीं।
सिया ने काँपते हुए कहा—
“मुझे ये नॉर्मल नहीं लग रहा…”
अचानक एक पुराना पेंडुलम घड़ी अपने आप चलने लगी—
बिना किसी हवा, बिना किसी हलचल के।
टक…टक…टक…
निहारिका के कदम रुक गए।
“बहन की मौत की रात भी…
ऐसी ही आवाज़ आई थी।”
अभिराज ने घड़ी को ध्यान से देखा।
“मतलब उसने हमारी उपस्थिति महसूस कर ली है।”
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⚠️ कदमों की आवाज़
चारों धीरे-धीरे हवेली के ड्राइंग रूम की तरफ बढ़े।
लेकिन अचानक—
ठक… ठक… ठक…
ऊपर वाली मंजिल से किसी के चलने की आवाज़ आई।
सिया ने तुरंत अभिराज की बाँह पकड़ ली—
“कोई… ऊपर है!”
आर्यन ने भी आवाज़ सुनी।
कदम धीमे नहीं थे…
बल्कि भारी…
जैसे कोई सदियों से चलना भूल चुका हो।
निहारिका ने सिर ऊपर उठाया।
“वह… आ गया है।”
अभिराज ने फौरन कहा—
“सब लोग मेरे पीछे रहो।”
लेकिन निहारिका आगे बढ़ी।
“नहीं…
अगर वो साया मेरा इंतज़ार कर रहा है
तो मुझे उससे बात करनी होगी।”
सिया चौंक पड़ी—
“क्या तुम पागल हो?!”
निहारिका मुस्कुराई नहीं।
उसकी आवाज़ शांत थी, पर डर के पार—
“वह सिर्फ मेरे खून से जवाब चाहता है।
अगर मैं पीछे हट गई…
तो यह हवेली कभी किसी को चैन से नहीं जीने देगी।”
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🕯️ ऊपर का दरवाज़ा अपने आप खुला
अचानक ऊपर की मंज़िल का लकड़ी का दरवाज़ा
धीरे-धीरे खड़खड़ाते हुए खुल गया।
चारों जम गए।
दरवाज़ा खुद से…
हवा बिना…
बस धीरे-धीरे खुला।
अभिराज फुसफुसाया—
“यह बुलावा है।”
निहारिका एक कदम आगे बढ़ी।
पर तभी—
सारे गलियारे की लाइटें एक साथ टिमटिमाने लगीं।
और हवेली की दीवारों पर पुराने खून के निशान उभर आए।
सिया ने चीख मार दी—
“ये खून… क्या ये असली है?!”
निहारिका ने कहा—
“ये यादें हैं…
लेकिन इनका असर असली होता है।”
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👤 ऊपर खड़ा था… साया
चारों जब ऊपर पहुंचे
तो वहाँ का गलियारा पहले से भी ज्यादा अँधेरा था।
पल-पल सन्नाटा गहरा रहा था।
तभी…
गलियारे के अंत में एक धुंधली आकृति खड़ी दिखाई दी।
लंबा कद।
झुका हुआ शरीर।
कंधों से गिरती पुरानी फटी हुई चादर।
आँखें लाल…
पर जीवित नहीं—
जैसे खुद दर्पण ने उन्हें तराशा हो।
सिया काँपकर बोली—
“वो… वही है?”
निहारिका ने धीरे से कहा—
“भाई…”
वह आकृति धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
उसके कदमों की आवाज़
जैसे किसी सूखी धातु को खींचा जा रहा हो।
अभिराज तुरंत निहारिका के सामने आ खड़ा हुआ—
“तुम एक कदम भी आगे नहीं जाओगी!”
पर साया रुक गया।
उसने सिर्फ निहारिका को देखा।
बाकी किसी को नहीं।
उसकी आवाज़ हवा में फिसलती हुई आई—
“मेरी… वारिस…”
निहारिका की साँस अटक गई।
उसके पैरों ने मानो खुद ब खुद एक कदम आगे बढ़ा दिया।
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🩸 साया निहारिका के बहुत करीब आया
साया अब सिर्फ कुछ ही कदम दूर था।
वह बोला—
“तू… उसका खून रखती है।
जिसे मैंने ख़त्म किया…
पर वो बच गई।”
निहारिका काँपते हुए बोली—
“तुमने अपनी ही बहन को मारा… क्यों?”
साया की आँखें हिंसा से चमक उठीं—
“क्योंकि हवेली ने कहा था—
वारिस एक ही होगा।”
सिया ने डर से आँखें बंद कर लीं।
आर्यन ने पहली बार उस साए को ध्यान से देखा और कहा—
“लेकिन तुम आज भी जिंदा क्यों हो?”
साया हँसा—
एक ऐसी हँसी जिसकी गूँज हड्डियों तक उतर जाए।
“क्योंकि हवेली ने मुझे बाँध लिया।
जब तक वारिस का खून खत्म नहीं होगा…
मैं नहीं मरूँगा।”
निहारिका की आँखों से आँसू बहने लगे।
“मतलब… तुम मुझे मारने आए हो?”
साया थोड़ा झुका।
उसकी आवाज़ फुसफुसाहट में बदल गई—
**“अगर तू नहीं मरी…
तो हवेली मुझे निगल जाएगी।”**
अभिराज गरज उठा—
“तुम उसे हाथ नहीं लगा सकते!”
लेकिन साया अचानक कड़क आवाज़ में बोला—
“वारिस की किस्मत वही पूरी करता है
जो उसका खून लेता है!”
निहारिका पीछे हट गई।
साया अपनी हाथ आगे बढ़ा ही रहा था—
कि दीवारें जोर से हिलने लगीं।
पूरा गलियारा लाल रोशनी से भर गया।
साया चीख उठा—
**“उसे हटाओ!
वह जाग गई है!”**
अभिराज चिल्लाया—
“कौन जाग गई है?!”
साया
गरजा—
“वारिस की आत्मा…!”
छत से धुआँ उतरने लगा।
और उसी धुएँ में—
एक लड़की की आकृति उभरी।
हवेली की पहली वारिस।
यानी निहारिका की पूर्वज बहन।
उसने निहारिका की तरफ हाथ बढ़ाया—
**“पीछे हट…
वह अभी तुझसे लड़ने लायक नहीं।”**
चौंक गए सभी।
निहारिका उसके सामने खड़ी थी—
आँखें आँसुओं से भरी लेकिन दिल मजबूत।