Adhuri Kitaab - 68 in Hindi Horror Stories by kajal jha books and stories PDF | अधुरी खिताब - 68

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अधुरी खिताब - 68

⭐ एपिसोड 68 — “अधूरी किताब का अंतिम पन्ना”

कहानी — अधूरी किताब



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हवेली की छत से उतरता धुआँ अब घना हो चुका था।
लाल और नीली रोशनी आपस में टकरा रही थीं—
जैसे वक़्त और रूहें आख़िरी बार आमने-सामने हों।

निहारिका अपनी जगह जमी खड़ी थी।
उसके सामने—
पहली वारिस की आत्मा,
और उससे कुछ दूरी पर—
वो साया…
जिसने सदियों पहले अपनी ही बहन का खून किया था।

अभिराज ने निहारिका का हाथ कसकर पकड़ रखा था।
सिया और आर्यन साँस रोके यह दृश्य देख रहे थे।

पहली वारिस की आत्मा की आवाज़ गूंज उठी—

“बहुत हो चुका।
अब कोई और क़ुर्बानी नहीं होगी।”

साया तड़प उठा।

“अगर यह ज़िंदा रही…
तो मैं मिट जाऊँगा!”

आत्मा ने ठंडी नज़रों से उसे देखा—

“तू तो उसी दिन मर गया था
जिस दिन तूने अपना खून बहाया।”

निहारिका ने पहली बार अपनी आवाज़ में पूरी ताक़त महसूस की—

“मैं तुम्हारी वारिस हूँ…
लेकिन तुम्हारी तरह नहीं।”

उसके शब्द हवेली की दीवारों से टकराए।
हवेली काँप उठी।


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🩸 अंतिम सच

पहली वारिस निहारिका की ओर मुड़ी।

“तुझे यहाँ इसलिए बुलाया गया
ताकि अधूरी किताब पूरी हो सके।”

निहारिका की आँखें भर आईं—

“मेरी ज़िंदगी क्यों चुनी गई?
क्यों हर दर्द… मेरे हिस्से आया?”

आत्मा ने उसके माथे पर हाथ रखा।
एक तेज़ नीली रोशनी फैली।

निहारिका के सामने दृश्य बदलने लगे—

वो बच्ची…
जिसके सपनों में ये हवेली आती थी।
वो आवाज़ें…
जो उसे बचपन से बुलाती थीं।

और एक सच—

हवेली ने उसे नहीं चुना था।
उसने हवेली को चुना था।

क्योंकि निहारिका में वो ताक़त थी
जो श्राप को तोड़ सकती थी।

आत्मा बोली—

“हर वारिस हवेली को चलाता है।
पर तू… उसे मुक्त करेगी।”


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⚔️ साया और हवेली का आख़िरी खेल

साया ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।

“मुक्ति?
हवेली बिना खून के कभी नहीं छूटती!”

उसने अपनी परछाईं फैलानी शुरू की।
दीवारों से काले हाथ निकलने लगे।

सिया चीख उठी।

आर्यन ने अभिराज से कहा—

“अगर हवेली को ताक़त खून से मिलती है…
तो इसे रोकने का एक ही तरीका है।”

अभिराज समझ गया।
वह निहारिका की ओर मुड़ा—

“तुम्हें कलम से लिखना होगा।”

निहारिका चौंकी—

“अभी?”

अभिराज की आवाज़ दृढ़ थी—

“अभी नहीं लिखा…
तो कभी नहीं लिख पाओगी।”

निहारिका ने अपनी जेब से “अधूरी किताब” निकाली।
और दूसरी ओर—
वो नीली चमकती कलम।

हवेली की सारी आवाज़ें अचानक थम गईं।
जैसे सब कुछ… उसके शब्दों का इंतज़ार कर रहा हो।


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✍️ अधूरी किताब का अंतिम अध्याय

निहारिका ने कांपते हाथों से किताब खोली।
पन्ने खुद पलटने लगे।

अंतिम पन्ने पर लिखा था—

> “यहाँ अंत नहीं…
यह निर्णय लिखा जाएगा।”



निहारिका ने गहरी साँस ली।
कलम ने काग़ज़ को छुआ।

और वह लिखने लगी—

> “मैं, निहारिका,
इस हवेली के हर श्राप को
हर खून से मुक्त करती हूँ।
आज के बाद
यहाँ कोई वारिस नहीं होगा,
कोई साया नहीं बचेगा,
कोई आत्मा क़ैद नहीं रहेगी।”



हवेली ज़ोर से दहाड़ उठी।

साया चीख पड़ा—

“रुको!
अगर यह लिखा पूरा हुआ
तो सब खत्म हो जाएगा!”

वह निहारिका की ओर झपटा।

अभिराज उसके सामने कूद पड़ा।

“अब नहीं!”

साया का हाथ अभिराज को छूने ही वाला था
कि पहली वारिस की आत्मा बीच में आ गई।

उसने पहली बार मुस्कुराकर कहा—

“अब मेरी बारी है।”

उसने साए को कसकर पकड़ लिया।


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🌫️ मुक्ति की कीमत

निहारिका लिखती रही।
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे
लेकिन हाथ नहीं रुके।

> “हवेली की हर दीवार,
हर कमरा,
हर चीख—
आज से शांत होगी।”



पहली वारिस ने साए को देखा—

“भैया…
अब बस।”

साया तड़प उठा।

“मैं डरता था…
इसलिए मैंने मारा…”

पहली वारिस की आवाज़ भर आई—

“और उसी डर ने
तुझे राक्षस बना दिया।”

नीली रोशनी तेज़ हो गई।

साया और आत्मा—
दोनों उस रोशनी में घुलने लगे।

पहली वारिस ने आख़िरी बार निहारिका को देखा—

“तूने वो कर दिखाया
जो मैं नहीं कर पाई।”

और फिर…
दोनों गायब हो गए।


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🕊️ हवेली की साँसें थम गईं

जैसे ही निहारिका ने आख़िरी शब्द लिखा—

> “अधूरी किताब…
अब पूरी हुई।”



कलम हाथ से गिर गई।

पूरा कमरा उजाले से भर गया।

दीवारों के खून के निशान मिटने लगे।
दरारें भरने लगीं।
हवेली… रो नहीं रही थी।

वह पहली बार…
शांत थी।

निहारिका बेहोश होकर गिर पड़ी।

अभिराज ने उसे पकड़ लिया।


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🌅 सुबह की पहली रोशनी

जब निहारिका की आँख खुली
तो खिड़की से धूप अंदर आ रही थी।

हवेली…
अब बस एक पुरानी इमारत लग रही थी।
कोई ठंड नहीं।
कोई आवाज़ नहीं।

सिया मुस्कुराई—

“लगता है… सब खत्म हो गया।”

आर्यन ने चारों ओर देखा—

“या शायद…
सब शुरू हुआ है।”

निहारिका ने किताब उठाई।
वो अब साधारण किताब थी।
कोई चमक नहीं।

उसने मुस्कुराकर कहा—

“अब ये कहानी किसी श्राप की नहीं…
बल्कि आज़ादी की है।”

अभिराज ने उसका हाथ थामा।

“और तुम्हारी।”


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📖 अंतिम दृश्य

हवेली के गेट से बाहर निकलते समय
निहारिका ने पीछे मुड़कर देखा।

हवा हल्की थी।
आसमान साफ़।

उसे लगा…
जैसे किसी ने धीरे से कहा—

“धन्यवाद।”

निहारिका ने आँखें बंद कीं।

और पहली बार…
डर नहीं लगा।


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🌙 अधूरी किताब — समाप्त

क्योंकि कुछ कहानियाँ
खून से नहीं…
हिम्मत से पूरी होती हैं।

अगर आप चाहें, तो मैं