Trisha - 28 in Hindi Women Focused by vrinda books and stories PDF | त्रिशा... - 28

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त्रिशा... - 28

महीनों से त्रिशा के घर में जिस शादी की तैयारियां चल रही थी आखिरकार वह शादी पूरे रस्मों और रीती रिवाजों के साथ बड़ी ही धूमधाम से संपन्न हो ही गई। सारे कार्यक्रम बड़े अच्छे से संपन्न हो गए   और साथ ही भारी मन और नम आंखों से त्रिशा की विदाई भी हो गई। विदाई के भावुक पलों में सभी ने एक दूसरे को धीरज दिया और त्रिशा को धीरज के साथ बहुत सारी हिम्मत भी दी। साथ ही उसे यह आश्वासन भी दिया कि भले ही वो इस घर से विदा होकर जा रही हो पर कभी इस घर के लिए ओर इस घर के लोगों के लिए वो पराई नहीं होगी। उसे जब भी जिस भी चीज की जरूरत हो वो बेझिझक बोल सकती है। साथ ही साथ उसे यह भी आश्वासन दिया गया कि जीवन में कभी भी किसी भी मोड़ पर यदि उसे उसके इस परिवार की जरूरत हुई तो वो सब सदैव उसके लिए खड़े है। 

राजन के घरवालों ने फैसला किया था कि यहां से नई नवेली दुल्हन को पहले राजन की नानी के घर( त्रिशा की बुआ की ससुराल) ले जाया जाएगा, जहां पग फेरे की रस्म के बाद नए जोड़ा घूमने के लिए केरल के लिए निकल जाएंगे और  उसके अन्य रिश्तेदार अपने अपने घर वापिस लौट जाएगें। 

ठीक इसी प्रकार विदाई के बाद डरी, सहमी सी, घबराई हुई नई बहू त्रिशा को उसकी नानी सास के घर लाया गया। जहां उसका स्वागत बढ़ी‌ ही धूमधाम और अच्छे से हुआ। सभी रस्में निभाते हुए नई बहू का गृह प्रवेश कराया गया। आलते से पैरों के निशान बनाकर और हल्दी की थाप दरवाजे पर लगाकर बहू ने घर में प्रवेश किया और फिर धीरे धीरे बाकी की रस्मों की शुरुआत की गई। 

बहुत दिनों की थकान तो थी ही और ऊपर से रात भर जगने  और किसी ना किसी रस्मों में लगे होने के कारण त्रिशा बहुत थक चुकी थी। उसका शरीर थकान से टूट रहा था और आंखें लाल हो चुकी थी। त्रिशा वहां औरतों के बीच घूंघट करके बैठे बैठे बस यही सोच रही थी कि आखिर कब यह सब रुके और वो कुछ देर के लिए लेटकर कमर सीधी कर ले। पर बेचारी किसी से कुछ कह भी तो नहीं सकती थी। 

वह यह सब सोच ही रही थी कि तभी त्रिशा की बुआ ने आकर उससे कहा," त्रिशा!!!! बच्चे थक गए‌ होगे ना??? देखो तुम्हारा काम यहां पर खत्म हो चुका है अब तुम अपने कमर में जाकर आराम कर लो!!!!!!!
चलों मैं तुम्हें छोड़ आती हूं।।" 

इतना कहकर उसकी बुआ ने उसे अपना हाथ दिया और त्रिशा मन ही मन भगवान का शुक्रिया करते हुए अपना लंहगा संभालकर खड़ी हुई और उनके साथ चलने लगी। चलते चलते बुआ बोली," बच्चे परेशान ना‌ होना यहां सब तेरे अपने ही है!!!!! तुझे कोई भी परेशानी हो तो मुझे कहना ठीक!!!!! अब जा और देख डरना नहीं राजन भी बस अभी आता ही होगा तो उसके आने से पहले और आने के बाद‌ भी तुझे डरने की जरुरत नहीं है बेटा!!!!!!!आज बहुत ही खास दिन है तेरे जीवन का इसलिए बिना डर के जी इन पलों को। " 

त्रिशा ने हां में अपना सिर हिलाया और फिर दोनों एक कमरें तक पहुंची है। बुआ ने कमरा खोला और फिर दोनों अंदर चले गए। त्रिशा आराम से बैड पर जाकर बैठ गई और उसने अपना घूंघट हटा लिया। घूंघट हटा कर त्रिशा ने पूरे कमरे में नजर मारी और देखा कि सारा कमरा फूलों से सजा हुआ है। गुलाब और मोगरे के सुंदर खिले हुए  फूलों कि सुगंध से पूरा कमरा महक रहा है। 

"त्रिशा बेटा यह टेबल पर तेरा और राजन का खाना रख दिया है पहले कुछ खा लेना और गिलास में दोनों का दूध रखा है ठीक!" बुआ ने त्रिशा से कहा। 

"जी बुआ!!!!"त्रिशा ने जवाब दिया। फिर त्रिशा की बुआ ने त्रिशा का माथा चूमा और प्यारी सी मुस्कान देकर कमरे से चली गई। 

बुआ के जाने के बाद त्रिशा कमरें में अकेले बैठी थी। उसने घड़ी में देखा तो शाम के छह बज रहे थे‌। आज सुबह छह बजे वो यहां आई थी और तभी से कोई ना कोई रस्म या रिश्तेदार  आ जाता और इसी चक्कर में त्रिशा को आराम करने का टाईम ही नहीं मिला। बीच में दो बार उसे लेटने का मौका मिला भी पर वह मौका भी बस दस पंद्रह मिनट का था। इसलिए अब फुरसत में मिला समय पाकर त्रिशा सुकुन में बैठी। 

भूख के मारे त्रिशा के पेट में चूहे कूद रहे थे और कुछ कुछ डर के मारे उसके पेट में गुड़गुड़ भी हो रही थी। एक अजीब सी मरोड़  उसके पेट में उठ रही थी और दिल में एक अजीब सी घबराहट रह रह कर उठ रही थी। अपने सामने खाना रखा देख त्रिशा की भूख और भी बढ़ गई थी लेकिन मां और मामी का हुक्म था कि पति से पहले ना खाना। तो बेचारी आते ही उनकी नसीहत कैसे भूल जाती। 
खैर अपनी भूख को काबू करते हुए त्रिशा वहीं बैठ गई और राजन के आने का इंतजार करने लगी। 

थकान से त्रिशा को नींद आ रही थी और भूख की वजह से वह सो भी नहीं पा रही थी। उसकी नजर कभी घड़ी पर तो कभी दरवाजे पर ही टिकी थी। हर आहट पर उसे लगता कि उसका इंतजार खत्म होगा और वह चैन से खाना खा सकेगी‌। पर उसका इंतजार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा  था। घड़ी अपनी रफ्तार से चलने में लगी हुई थी, समय बीत रहा था पर त्रिशा का इंतजार खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। 

धीरे धीरे अब घड़ी में साढ़े सात होने को थे और अब त्रिशा का हाल भूख और थकान से बेहाल हो चुका था। अब उसका इंतजार उसपर भारी होता जा रहा था। उसके‌ बस में नहीं था और अब भूखे रहने का। अगर इस से ज्यादा वो भूखी रहती तो या तो खाली पेट उल्टी करती या फिर चक्कर खा कर बेहोश हो जाती। अंत में जब इंतजार कर कर के अपनी हालत से थक हार कर भूख से व्याकुल त्रिशा ने आठ बजे खाने की थाली उठाई और  आखिरकार खाना शुरु कर ही दिया।