"क्या????????
ऐसे टुकुर टुकुर क्या देख रही है मेरी तरफ?????" राजन ने त्रिशा को अपनी ओर देखने के बाद कहा।
पर त्रिशा जवाब देती उससे पहले राजन बोला," अच्छा अब समझा मैं!!!!!!!!! आज तो हमारी शादी के बाद की पहली रात है।।।।। मतलब हमारी सुहागरात है।।।।।। तू ये सब ताम झाम इसलिए ही पहन कर बैठी है ना क्योंकि तू मुझसे ये सब उतरवाना चाहती थी !!!!!!!!!!" फिर बहुत ही बेअदबी से हंसते हुए राजन ने त्रिशा को ऊपर से नीचे तक देखते हुए कहा," तो पहले बोलना चाहिए था ना तुझे!!!!!!!!! अब तो तू मेरी पत्नी है और तेरी इस इच्छा को मैं मना कोई करता !!!!!!!!
अरे, पगली तू पत्नी है रे मेरी और तो मेरा फर्ज है ना तुझे हर तरह से खुश रखने का!!!!!!"
त्रिशा को अपने कानों और आंखों पर अभी तक भरोसा नहीं हो रहा था कि यह आदमी जो इस समय उसके आगे यह सब बोल रहा है वो उसका खुद का ही पति है। भरोसा भले चाहे हो या ना हो पर सच तो यही था जो इस समय हो रहा था। पर राजन ने अभी जो कुछ भी कहा वो त्रिशा के आत्म सम्मान पर आघात था। उसका कहा एक एक शब्द उसे बहुत ही गंदा लग रहा था। अपने लिए एक और अपशब्द सुन पाना उसके बर्दाश्त करने के बाहर था। उसके अंदर का गुस्सा फूट पड़ा।
वह गुस्से में भरी अपनी लाल आंखों से राजन को देखकर उसकी आंखों में आंखें डालकर बोली," बस........... बस भी किजिए अब!!!!!!!" आप पति है मेरे इसलिए आपका सम्मान करना फर्ज है मेरा, लेकिन अपना सम्मान कराने के चक्कर में आप मेरा आत्म सम्मान इस तरह छलनी नहीं कर सकते हैं!!!!!!!!"
" आप रहिए इस कमरे में अकेले मैं जा रही हूं यहां से। आप नशे में है और आपसे इस समय कोई भी बात करना बेकार ही है।"
इतना कहकर त्रिशा राजन की पकड़ से खुद को छुड़ा कर कमरे से बाहर की ओर चल पड़ी। त्रिशा का जवाब सुनकर राजन एक पल को सकते में आ गया। उसने कभी सोचा ना था कि दबी दबी सी रहने वाली त्रिशा भी उसे जवाब दे सकती है। उसने तो त्रिशा से शादी की हां ही बस इसलिए की थी कि क्योंकि जब वो त्रिशा से मिला तो उसे वो गाय की तरह सीधी लगी और जिस तरह की उस से दबकर रहने वाली बीवी उसे चाहिए थी त्रिशा उसके लिए एकदम सही थी क्योंकि वो हमेशा उससे दब कर रहेगी। पर इस समय तो वह त्रिशा का कोई और ही रुप देख रहा था। राजन ने सोच लिया था कि आज वो त्रिशा को पूरी तरह से काबू में कर लेगा ताकि आज के बाद वो कभी उसके आगे अपना मुंह फिर ना खोले।
" मुझे आंख दिखा रही है!!!!!!" "अब तुझमें इतनी हिम्मत आ गई कि तू मुझे आंख दिखाएगी!!!!!!!"
"रुक जा अभी बताता हूं तुझे, मुझे आंख दिखाती है!!!!" राजन ने त्रिशा को गुस्से से घूरते हुए देखा और फिर त्रिशा की सिर की चुन्नी हटाने लगा। हालांकि उसमें इतना सब्र नहीं था कि वह आराम से इतनी पिन वगैराह को खोलता तो नशे की हालात में वो जैसे तैसे उन पिनों को खोलने और हटाने लगा। वहीं त्रिशा अपने हाथों से राजन को खुद से दूर हटाने की कोशिश करती रही। "हटिए!!!!!!"
" छोड़िए!!!!!"
"आ......"
"मैं कह रही हूं ना छोड़िए मुझे!!!! जाने दीजिए।।।।।" त्रिशा राजन से लगातार कहने लगी कि पर त्रिशा की आवाज को अनसुना करके छिना छपटी के बीच राजन ने त्रिशा की चुन्नी उसके सिर से हटा दी और फिर उसके बाद वह त्रिशा के बाल कसकर पकड़ कर बोला,
" पति हूं मैं तेरा!!!!! और तू मुझे ही आंखे दिखा रही थी!!!!!" पति भगवान के समान होता है और तू मुझसे बहस कर रही थी!!!!!!" "इतनी हिम्मत कहा से लेकर आई थी तू!!!!!!!" इतना कहते हुए राजन ने त्रिशा को उसके बालों से पकड़कर सीधे बैड की तरफ धकेलते हुए बोला," रुक आज तुझे मैं सबक सिखाता हूं!!!!!! आज समझाता हूं तुझे कि पति का सम्मान कैसे किया जाता है!!!!! उसे आदर कैसे दिया जाता है!!!!"
"आ........ह!!!!!!" बैड पर गिरते हुए त्रिशा के मुंह से चीख निकली। गिरने के बाद त्रिशा ने खड़े होकर खुद को संभालने की कोशिश की पर इससे पहले कि वह खुद को संभाल पाती राजन उस पर झपट पड़ा और उसने उसका हाथ पकड़ कर सीधा खड़ा किया और फिर उसके गाल पर एक थप्पड़ मारते हुए बोला, " यह थप्पड़ तेरी पहली गलती मुझसे पहले खाना खाने के लिए!!!!!!!!!"
अचानक से अपने गाल पर पड़े उस थप्पड़ से त्रिशा ऊपर से नीचे तक हिल गई। आज तक उसके ऊपर किसी ने हाथ उठाना तो दूर आवाज तक उठा कर बात नहीं की थी।
त्रिशा ने खुद को संभाला और एक हाथ से अपने गाल को सहलाने लगी पर इससे पहले कि वो पूरी संभल पाती, उससे पहले ही फिर से राजन ने उसके गाल पर एक दूसरा थप्पड़ मारते हुए कहा," यह मुझसे बहस करने और मुझ पर हुक्म चलाने की कोशिश करने के लिए!!!!!!!!"
"आ........" इस बार त्रिशा बैड की जगह सीधे जमीन पर गिरी। गिरी तो गिरी लेकिन इस बार इस थप्पड़ के साथ वो भी पूरी तरह सुन हो चुकी थी।
अभी तक उसमें प्रतिक्रिया देने की, अपने लिए बोलने की, राजन से सवाल करने की, उसे समझाने की ताकत थी पर अब........
अब वह अवाक थी, वह सकते में थी, सदमे में थी। और त्रिशा में जो हिम्मत थोड़ी देर पहले आई थी अपने लिए आवाज उठाने कि वह ना जाने कहां खो गई और फिर से त्रिशा डरी सहमी त्रिशा के रुप में आ गई थी। अब उसका शरीर सुन हो चुका था। अब उसे ना तो इन थप्पड़ों से कोई फर्क पड़ रहा था और ना ही राजन की किसी भी बात से।
लेकिन राजन को इन सब से कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। उसने फिर एक बार त्रिशा को बाल पकड़ कर उठाया और फिर एक के बाद एक ना जाने कितने थप्पड़ उसे मारता रहा और ना जाने उनके लिए कौन कौन सी वजह गिनाता रहा। वह ना जाने क्या क्या नशे में बोलता रहा और त्रिशा किसी पुतले की तरह बस कभी इधर तो कभी उधर गिर पड़ रही थी। उसकी चीख और आह भी अब धीमी होती जा रही थी क्योंकि उसे पता था कि अब इसका कोई फायदा नहीं है। अब यहां उसे बचान कोई नहीं आयेगा और उसे यह सब झेलना ही होगा।