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“मेरे बाद अगर तुम्हें किसी से प्रेम हो जाए, तो बेझिझक उस प्रेम को अपना लेना... उसके साथ हर खुशी बाँटना, हर दर्द में उसका सहारा बन जाना... मेरी यादों को दिल में कहीं सजा कर रखना, पर उन्हें अपनी राह की बेड़ियाँ मत बनने देना... जब कभी मेरा ख़्याल आए, तो बस एक हल्की सी मुस्कान के साथ मुझे याद कर लेना और फिर उसी मुस्कान के साथ, अपनी ज़िंदगी को खुलकर जीते रहना...
तेरे इंतजार में है..... पर तुझे अपनाएंगे नहीं। सफर में डर लगेगा, मगर घबराएंगे नहीं। अब यह भी नहीं कह सकते कि सिर्फ तुम्हारी कसमें झूठी निकली, कहा तो हमने भी था कि तुम्हारे बिन जी पाएंगे नहीं। कोई लकीरें देख कर बता सकता हैं तो बता दे...... कि वह दिन कब आएगा जब वो याद आएगी नहीं ।। वह तुम ही हो जिसे हम सब बताना चाहते हैं और वह तुम ही हो जिसे हम कुछ बताएंगे नहीं ।। खबर मिलते ही चली आना, कह दिया है मैंने, तुम्हारे आए बिना यह लोग मुझे जलाएंगे नहीं ।। इस सफर में डर लगेगा, लेकिन घबराएंगे नहीं..
अगर मौका मिला कभी, तो कागज़ पर अपनी थकान लिखूँगा, मज़बूत कंधों के पीछे छुपा, वो छोटा सा इंसान लिखूँगा। वो जो हर मुश्किल में मुस्कुरा कर कहता है, "सब ठीक हैं," उस एक झूठ के पीछे दबे, हज़ारों बेबस तूफान लिखूँगा। नहीं लिखूँगा मैं सिर्फ अपनी जीत के चर्चे दुनिया में, मैं तो हार कर भी जो मुस्कुराया, वो लहूलुहान स्वाभिमान लिखूँगा। लिखूँगा वो रातें, जब तकिया गवाह था मेरी सिसकियों का, पर सुबह उठकर फिर से पहना, वो चट्टान जैसा इंसान लिखूँगा। मैं लिख पाऊं कुछ तो, मैं खुद को लिखूँगा, अपनी रूह के हर जख्म को, अपना ही सम्मान लिखूँगा।
मेरे हालात कभी मेरी आँखों में भी चमक हुआ करती थी... हर सुबह किसी नए सपने के साथ शुरू होती थी। मैं भी सोचा करता था कि जिंदगी बहुत खूबसूरत होगी... मेरे हिस्से में भी खुशियाँ आएंगी... मैं भी कहीं दूर जाऊँगा... कुछ बनूँगा... और अपने लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाऊँगा... लेकिन धीरे-धीरे सब बदलता चला गया... जिन रास्तों पर चलने का सपना देखा था, उन्हीं रास्तों ने मुझे बीच में ही छोड़ दिया। जिन ख्वाहिशों को दिल में सबसे संभालकर रखा था, वो खामोशी से मेरी आँखों के सामने टूटती चली गईं... और मैं बस देखता रह गया... कुछ कर नहीं पाया। अब हालत ये है कि हँसी आती भी है तो सिर्फ दिखाने के लिए आती है... दिल से तो जैसे मुस्कुराना ही भूल गया हूँ। लोग पूछते हैं - "इतने चुप क्यों रहने लगे हो?" उन्हें क्या पता... कुछ आवाजें अंदर ही अंदर इतनी टूट जाती हैं कि बाहर आना ही छोड़ देती हैं। पहले अकेलापन डराता था... अब वही अकेलापन सबसे अपना लगता है। पहले लोगों से बातें करके सुकून मिलता था... अब खामोशी ही सबसे सच्ची लगती है। कभी-कभी सोचता हूं क्या सच में वो मैं ही था जो इतना खुश रहा करता था...? या वो कोई और ही इंसान था जो धीरे-धीरे कहीं रास्ते में खो गया... अब तो बस दिल यही चाहता है कि कोई पूछे भी नहीं हाल मेरा... क्योंकि सच बनाने की हिम्मत भी नहीं बची और झूठी मुस्कान दिखाने की ताकत भी नहीं रही...
"याद है तुम्हें" याद है तुम्हें... कभी हमारी बातें इतनी लंबी होती थीं कि रात कब गुजर जाती थी, हमें पता ही नहीं चलता था... और फिर भी लगता था कुछ बाकी रह गया है कहने को। सुबह मेरी आँख तुम्हारे "जाग गए...?" वाले मैसेज से खुलती थी... और दिन तुम्हारे "अपना ध्यान रखना..." पर खत्म होता था। तुम हर छोटी चीज़ पूछते थे-खाना खाया या नहीं... दवा ली या नहीं... थक तो नहीं गये... तब समझ नहीं आता था कि कोई इतना ख्याल भी रख सकता है। अब वही दिन हैं... वही सुबह है... वही रातें हैं... बस तुम्हारी आवाज़ नहीं है। कभी-कभी आज भी आदत से मजबूर होकर मोबाइल उठा लेता हूँ... फिर याद आता है-अब पूछने वाला कोई नहीं रहा। सच कहूँ... तुम चले तो बहुत पहले गए थे... लेकिन तुम्हारी कमी आज भी रोज़ नई लगती है... कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते... बस उम्रभर चुपचाप अंदर दर्द बनकर रह जाते हैं...
तुम्हें असंख्य पीड़ाओ से मुक्त करने वाला ये प्रेम अंत में ऐसी पीड़ा देगा, जिससे मुक्ति देना सिर्फ मृत्यु के लिए संभव होगा।।
पता है, तुम वादे ऐसे किया करते थे जैसे पूरी दुनिया छोड़ सकते हो, पर मुझे कभी नहीं छोड़ोगे। तुम्हारी बातों में इतना यक़ीन था कि लगता था, सारी दुनिया गलत हो सकती है... लेकिन तुम नहीं। ऐसा मेरा मानना ही नहीं, मेरा यक़ीन था। मैंने तुम्हें अपने भरोसे की सबसे ऊँची जगह पर रखा था, इतनी ऊँची कि कभी-कभी तुम्हें खुदा से भी ऊपर मान बैठा। मुझे लगता था कि अगर सब कुछ टूट भी जाए, तो तुम्हारे वादे मुझे थामे रखेंगे। पर शायद मुझे नहीं पता था कि सबसे ज़्यादा चोट वहीं से लगती है जहाँ हम सबसे ज़्यादा भरोसा करते हैं। फिर एक-एक करके सारे वादे टूटते गए, सारे भ्रम बिखरते गए, और मैं बस खड़ा देखता रह गया-उस भरोसे को, जिसे बनाने में साल लगते हैं और टूटने में बस एक पल। आज भी कभी-कभी यही सोचता हूँ-जिसे मैंने खुदा के ऊपर रखा, जिसे अपनी दुआओं से भी ज़्यादा माना, क्या उसका ऐसा करना सच में बनता था? या गलती मेरी ही थी, जो मैंने एक इंसान को अपनी दुनिया का खुदा बना लिया।
कान्हा, मैंने भी एक "पाप" किया है- मैंने प्रेम किया है। तुमने तो गंगा दी इस संसार के पाप धोने को, पर क्या एक और गंगा नहीं दे सकते उस प्रेम के लिए जो भीतर ही भीतर मुझे खाए जा रहा है? यह कैसा पाप है, माधव- जो किसी को चोट नहीं देता, पर करने वाले को ही तोड़ देता है। अगर हो सके तो एक ऐसी गंगा बना दो, जहाँ मैं डुबकी लगाऊँ और यह अधूरा प्रेम, यह अनकही पीड़ा सब धुल जाए... मेरे भीतर का यह बोझ बह जाए, और मैं फिर से हल्का हो सकूँ।
"मैं कर्जदार हूँ उसका" मैं हमेशा उस माँ की बेटी का कर्ज़दार रहूँगा... जिसने मुझे अपना शरीर छुने दिया था... उसने मुझ पर भरोसा किया था... वो जब पहली बार मेरे सामने बैठी थी ना... तो उसकी आँखों में शर्म भी थी... डर भी था... और कहीं न कहीं एक यकीन भी था कि "मैं उसे कभी टूटने नहीं दूँगा..." उसने अपना हाथ मेरे हाथ में रखा था... जैसे कोई अपना पूरा भरोसा किसी के हवाले कर देता है... उस दिन समझ आया था- किसी लड़की का पास आना सिर्फ पास आना नहीं होता... वो अपनी इज़्ज़त, अपना विश्वास, अपनी पूरी दुनिया साथ लेकर आती है... आज चाहे वो बदल गई हो... या किस्मत उसे मुझसे दूर ले गई हो... लेकिन सच कहूँ- मैं आज भी उसके उस भरोसे के सामने सिर झुका कर खड़ा हूँ... क्योंकि हर किसी को इतना सच्चा भरोसा नहीं मिलता, और जिसे मिल जाए... वो उम्रभर उसका कर्ज़दार ही रहता है..
मुझे तुमसे गले मिलना है और बहुत देर तक मिलना है, जहाँ साँसें एक-दूसरे में खो जाएँ जहाँ शब्द अपनी जरूरत खो दें जहाँ सिर्फ धड़कनों की आवाज बचे और वक़्त भी थम कर बस देखे कि दो लोग कैसे एक दूसरे में घर पा लेते है। मुझे तुमसे ऐसे मिलना है जैसे कोई थका हुआ परिंदा आखिरकार अपनी शाख ढूंढ ले और फिर उसे उड़ जाने की कोई जल्दी न है
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