मेरे हालात
कभी मेरी आँखों में भी चमक हुआ करती थी... हर सुबह किसी नए सपने के साथ शुरू होती थी। मैं भी सोचा करता था कि जिंदगी बहुत खूबसूरत होगी... मेरे हिस्से में भी खुशियाँ आएंगी...
मैं भी कहीं दूर जाऊँगा... कुछ बनूँगा... और अपने लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाऊँगा... लेकिन धीरे-धीरे सब बदलता चला गया... जिन रास्तों पर चलने का सपना देखा था, उन्हीं रास्तों ने मुझे बीच में ही छोड़ दिया।
जिन ख्वाहिशों को दिल में सबसे संभालकर रखा था, वो खामोशी से मेरी आँखों के सामने टूटती चली गईं...
और मैं बस देखता रह गया... कुछ कर नहीं पाया। अब हालत ये है कि
हँसी आती भी है तो सिर्फ दिखाने के लिए आती है... दिल से तो जैसे मुस्कुराना ही भूल गया हूँ। लोग पूछते हैं - "इतने चुप क्यों रहने लगे हो?" उन्हें क्या पता...
कुछ आवाजें अंदर ही अंदर इतनी टूट जाती हैं कि बाहर आना ही छोड़ देती हैं। पहले अकेलापन डराता था...
अब वही अकेलापन सबसे अपना लगता है। पहले लोगों से बातें करके सुकून मिलता था... अब खामोशी ही सबसे सच्ची लगती है। कभी-कभी सोचता हूं
क्या सच में वो मैं ही था जो इतना खुश रहा करता था...? या वो कोई और ही इंसान था जो धीरे-धीरे कहीं रास्ते में खो गया... अब तो बस दिल यही चाहता है कि कोई पूछे भी नहीं हाल मेरा...
क्योंकि सच बनाने की हिम्मत भी नहीं बची
और झूठी मुस्कान दिखाने की ताकत भी नहीं रही...