"याद है तुम्हें"
याद है तुम्हें...
कभी हमारी बातें इतनी लंबी होती थीं कि रात कब गुजर जाती थी, हमें पता ही नहीं चलता था... और फिर भी लगता था कुछ बाकी रह गया है कहने को। सुबह मेरी आँख तुम्हारे "जाग गए...?" वाले मैसेज से खुलती थी... और दिन तुम्हारे "अपना ध्यान रखना..." पर खत्म होता था।
तुम हर छोटी चीज़ पूछते थे-खाना खाया या नहीं... दवा ली या नहीं... थक तो नहीं गये...
तब समझ नहीं आता था कि कोई इतना ख्याल भी रख सकता है।
अब वही दिन हैं... वही सुबह है... वही रातें हैं... बस तुम्हारी आवाज़ नहीं है।
कभी-कभी आज भी आदत से मजबूर होकर मोबाइल उठा लेता हूँ...
फिर याद आता है-अब पूछने वाला कोई नहीं रहा।
सच कहूँ...
तुम चले तो बहुत पहले गए थे...
लेकिन तुम्हारी कमी आज भी रोज़ नई लगती है... कुछ रिश्ते खत्म नहीं होते...
बस उम्रभर चुपचाप अंदर दर्द बनकर रह जाते हैं...