“डर के साथ उड़ान”
मैं बचपन से उड़ती रही,
आसमान मेरे लिए खेल का मैदान था,
पर हर उड़ान में
दिल के कोने में
एक डर बैठा रहता था।
ऊँचाई बुलाती थी,
ज़मीन पकड़ कर खींचती थी,
और मैं—
दोनों के बीच
खुद को पहचानती थी।
लोग कहते रहे—
“नीचे रहो, सुरक्षित रहो”
पर मेरी आत्मा ने
हमेशा कहा—
“ऊपर जाओ, सच वहीं है।”
डर ने मुझे रोका नहीं,
उसने मुझे
संभलना सिखाया।
मैं गिरी नहीं,
क्योंकि डर के साथ
हौसला भी उड़ता था।
आज भी उड़ती हूँ,
फर्क बस इतना है—
अब डर मेरा दुश्मन नहीं,
मेरी चेतना है।
मैं वही हूँ
जो ऊँचाई से डरती भी है
और फिर भी
उड़ना नहीं छोड़ती।