पत्र तुमने पढ़ा नहीं
लिखा था," गगन में असंख्य नक्षत्र हैं
असंख्य तारों में दूरी बड़ी है,
धरती पर गाँव बसे हैं
इधर-उधर शहर जुड़े हैं,
प्यार के लिए अथाह जगह है।
जंगल में डर छुपा है
नदी में भँवर विचित्र है,
घरों के नाम बड़े हैं
पर मनुष्य का आवास न्यून है।
रखने को प्यार बहुत था
ममता का उधार बड़ा था,
पत्र जो पढ़ा नहीं
एक शब्द उसमें अदृश्य,गहन था।
बातें अक्षुण्ण थीं
सारांश संक्षिप्त था,
लोक-परलोक का विवरण लिखा था
मन ने मन को पढ़ा जहाँ था।
कथा कहने का मन हुआ
तुमने जिसे अनसुना किया,
घर से निकलना कठिन था
राह का मिलना जटिल था।
जीजिविषा जागी हुई थी
समय में संघर्ष छुपा था,
पत्र जो मैंने लिखा था
प्यार में प्रकट हुआ था।
***
*** महेश रौतेला