न्याय की प्रतीक्षा में निर्मला
“माँ, होमवर्क करके जल्दी लौट आऊँगी।”
निर्मला ने अपने दोस्तों के लिए छोटे से प्लास्टिक में कुछ अमरूद बाँधे, अपनी पुरानी साइकिल निकाली और मुस्कुराते हुए घर के आँगन से निकल गई।
दिन ढल गया।
शाम हो गई।
लेकिन निर्मला नहीं लौटी।
बम दीदी-बहन के घर से दोपहर 2 बजे ही निकल चुकी निर्मला, शाम 8 बजे तक भी घर नहीं पहुँची। घबराए हुए माता-पिता पुलिस चौकी पहुँचे। वहीं उन्हें राज्य से पहला धोखा मिला।
“किसी लड़के के साथ चली गई होगी, घूम रही होगी।”
अपनी बेटी के लापता होने की पीड़ा से तड़पते माता-पिता पर वर्दीधारी रक्षकों की यह असंवेदनशील टिप्पणी थी। अगर उसी रात तुरंत खोज अभियान शुरू हो जाता, तो शायद इस कहानी का अंत कुछ और होता।
अगली सुबह— 11 साउन।
घर से कुछ ही दूरी पर गन्ने के खेत में निर्मला का निर्जीव शरीर मिला। उस दृश्य ने सिर्फ इंसानों को नहीं, बल्कि मानवता को भी झकझोर दिया। लेकिन उस भयावह घटना से भी ज़्यादा डरावना दृश्य इसके बाद देखने को मिला।
अपराध जांच में घटनास्थल को ‘मंदिर’ माना जाता है, लेकिन यहाँ रक्षक ही भक्षक के साथी बन गए। एक मासूम बच्ची के शव के पास मिली सलवार— जो बलात्कार का सबसे अहम सबूत हो सकती थी— पुलिस ने खुद पानी में धो दी।
क्या यह सिर्फ अज्ञानता थी?
या किसी के गुनाह धोने की सुनियोजित साज़िश?
भीड़ इकट्ठा हुई। निर्मला की साइकिल, कॉपी-किताबें शव से कुछ दूरी पर बिखरी पड़ी थीं। लेकिन संघर्ष का कोई निशान नहीं था। मानो हत्या कहीं और करके शव यहाँ सजा दिया गया हो।
सबूत मिटाने की जल्दबाज़ी में फॉरेंसिक टीम के पहुँचने से पहले ही शव हटा दिया गया। सच्चाई हमेशा के लिए उसी गन्ने के खेत की मिट्टी में दबा दी गई।
जन आक्रोश बढ़ता गया।
राज्य ने एक ‘पात्र’ खड़ा किया— दिलीप सिंह बिष्ट। 41 वर्षीय मानसिक रूप से असंतुलित व्यक्ति।
पुलिस ने तैयार की हुई पटकथा सुनाई—
“इसी ने निर्मला की हत्या की है।”
सबूत के नाम पर उसकी फटी हुई कमीज़ दिखाई गई।
बाद में बंद कमरे के भीतर की सच्चाई सामने आई—
“इस अपराध को स्वीकार कर ले, हम तुझे मांस और शराब देंगे, नहीं तो मार देंगे।”
एक मानसिक रोगी पर किया गया यह अत्याचार न्याय प्रणाली के चेहरे पर लगा काला धब्बा था।
लेकिन झूठ की उम्र लंबी नहीं होती।
निर्मला के शरीर से लिए गए (चाहे जितने भी विवादित क्यों न हों) डीएनए नमूने दिलीप के डीएनए से नहीं मिले।
विज्ञान ने राज्य के झूठ को मानने से इनकार कर दिया।
एक निर्दोष बच गया, लेकिन असली अपराधी आज भी पर्दे के पीछे मुस्कुराता रहा।
निर्मला के लिए न्याय माँगते ही सड़कें आग बन गईं।
पूरा देश रो पड़ा। कंचनपुर की सड़कों पर नारे गूँजे—
“सरकार, निर्मला को न्याय दो!”
लेकिन सरकार ने न्याय की जगह गोलियाँ चलाईं।
8 भदौ।
17 वर्षीय सन्नी— निर्मला के लिए न्याय माँगने सड़क पर उतरा एक किशोर— पुलिस की गोली से गिर पड़ा।
एक हत्या की जाँच करनी थी, राज्य ने जवाब में एक और हत्या कर दी।
आज वर्षों बीत चुके हैं।
घटनास्थल के पास की सेना की बैरक, बम दीदी-बहन का घर, बार-बार बदले गए बयान, घटना के तुरंत बाद रंगे गए कमरे, सलवार धोने वाले पुलिसकर्मी और शक के घेरे में खड़े ‘वीआईपी’ चेहरे— सब आज भी रहस्य के गर्भ में हैं।
निर्मला के पिता यज्ञराज पंत— न्याय माँगते-माँगते मानसिक रूप से टूट चुके हैं।
माँ दुर्गा देवी— राज्य से लड़ते-लड़ते अंततः हार मानने को मजबूर हो गईं।
इस कहानी का अंत अभी लिखा जाना बाकी है।
निर्मला का हत्यारा आज भी आज़ाद घूम रहा है।
उसके नाम पर कार्यक्रम चलाने वाले मंत्री बने, प्रधानमंत्री बदले, कानून मंत्री, आईजीपी, डीआईजी— सब बदल गए।
लेकिन एक सच्चाई आज भी नहीं बदली—
“निर्मला की आत्मा को अब तक शांति नहीं मिली है।”
निर्मला पंत को हार्दिक श्रद्धांजलि