ईश्वर ने परिंदों को ही
आसमान और ज़मीन के बीच
संतुलन की आज़ादी दी है,
पंख भी दिए,
और लौट आने की समझ भी।
इंसान को ज़मीन दी गई थी
चलने के लिए,
और आसमान
देखने के लिए—
पर उसने
देखने की जगह
हड़पने की चाह रख ली।
वो उड़ना चाहता है
बिना पंखों के,
ऊँचाई चाहता है
बिना विनम्रता के,
और ईश्वर बनना चाहता है
बिना इंसान बने।
परिंदे जानते हैं
कब उड़ना है,
कब बैठ जाना है,
इंसान यही भूल जाता है—
इसी भूल में
वो अक्सर
ओंधे मुँह ज़मीन से टकराता है।
क्योंकि
आसमान छूने के लिए
पंख नहीं,
मर्यादा चाहिए।
आर्यमौलिक