मैं मोहब्बत में पड़ी नासमझ लड़की,
तुम मेरी एहसासों तले दबे दर्द को समझ पाए क्या?
संस्कारों से बंधी हूं मैं जरा सम्भल कर रहना,
समाज के बनाए रिवाजों को तोड़ पाए क्या?
मुक्कमल हों, मुझसे ज्यादा तुम्हारी दिल्लगी जरूरी थी
मुझसे ज्यादा तुम मोहब्बत कर पाए क्या?
- M K