मैं आपके लिए क्या लिखूँ, लिखता हूँ जब आपके लिए।
शब्दों में रंगत कम पड़ जाती, सोचता हूँ फिर क्या लिखूँ आपके लिए।
आप तो बागों के माली हैं, फूलों में महक भर देते हैं।
क्यों न मैं खुद महक बन जाऊँ, जब आप जीवन महका देते हैं।
आप बागों की चहल-पहल हैं, क्यों न मैं खुद फूल बन जाऊँ आपके लिए।
मुरझाए फूल भी खिल उठते, जब आप मुस्काते फूलों के लिए।
आपके शब्दों में रंगत है, मेरा शब्द अभी अधूरा है।
जब आप मिलते फूलों से, हर फूल भी तब पूरा है।
एसटीडी कलम से लिखा ये पैगाम है,
"बालकवि बैरागी" नाम तो दिया आपने ही इनाम है।
लेखक /कवि - एसटीडी मौर्य ✍️