मैं और मेरे अह्सास
अंजाम
मोहब्बत में अंजाम बिछड़ने का नसीब था l
उतनी दूर चला गया जीतना ही करीब था ll
दुनिया में मुकम्मल नाम दाम कमाया हुआ l
अमीरजादा दिलों दिमाग से भी गरीब था ll
मिलना बिछड़ना इत्तिफ़ाक़ होता है कि l
जैसा भी था फिर भी वो ही हबीब था ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह