"क्लिक क्लिक"
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कैमरा,क्लोजप,शॉट
गुनाह, मुजरिम, कैद
क्लिक…
गुजर गई शाम
कोई तस्वीर
नहीं खींची
बस ऊंची
दीवारों पर लगे
लोहे के खंभे
मुझे देखते रहे।
एक कैदी
मर गया
आजादी से पहले
वह तो कल ही
रिहा होनेवाला था।
किसी जमीन ने
निगल लिया
बेंच पर बैठी
बुढ़िया को
उसके सपने मृतकों
से बातें करते हुए
कैद हो गए
ईश्वर की पेंटिंग में।
बारिश बहुत मात्रा में
हो सकती है
कोई अंदाजा लगाता रहा
आज तीसरा दिन है
बादल बस गुस्सा होते हुए
खींच रहे हैं रौशनी से भरी क्लिक को।
यहां वातावरण ही
फैला है
उसका वजूद
आंखों में चमकता
हुआ मस्तिष्क की
जटिल संरचना में
किसी न्यूरॉन्स से
उलझा सा हवा को
बंद करना चाहता है।
नन्ही गुड़िया
सोई नहीं
उसके शुष्क
चित्र नहीं रहते अब
किसी बच्चे की आंख में।
तिनका उड़ता हुआ
समय में फंस गया है
उसके भीतर भी निर्माण का
कोई तिनका निवारण खोज रहा है।
मैं सबको किसी अज्ञात
पेटी में
ताला बंद करते हुए
चाबी फेक देता हु।
अब कैमरा क्लोजप
नहीं लेता
न ही कोई दृश्य, स्थान
या व्यक्ति के भीतर
भ्रूण की तरह पांव मारता है।
कैदी दुर्गंध से
परेशान है
उनकी जेल में
कही लकड़हारे फाइलों
को जला रहे हैं,
जैसे कारागृह नहीं
मनकर्णिका घाट हो
जिसकी हर शाम
बुझते हुए ही निकलती है
हर बंदी फोटोग्राफी में
तरबेज एक फोटो ही
तो है।
क्लिक… क्लिक…
पर कोई आवाज़ अब दर्ज नहीं होती
सिर्फ कंपन बचता है
हड्डियों के भीतर
धीरे-धीरे फैलता हुआ।
दीवारें अब सीधी नहीं रहीं
वे झुककर मेरे कान में कुछ फुसफुसाती हैं—
कि हर तस्वीर अपनी ही मृत्यु का
पूर्वाभ्यास होती है।
लोहे के खंभे जिन्होंने मुझे देखा था
अब जंग खाते हुए
मेरी आंखों में उग आए हैं
और मैं खुद को ही
कैद करता जा रहा हूँ।
एक और कैदी जिंदा है अभी
पर उसकी परछाई
पहले ही रिहा हो चुकी है
वह बाहर घूम रही है
भीड़ में
किसी और के चेहरे पर।
बुढ़िया की जगह अब एक गड्ढा है
जिसमें पानी नहीं
बल्कि समय जमा है
कोई उसमें झांकता है
तो अपना बचपन
डूबता हुआ देखता है।
ईश्वर अपनी पेंटिंग से बाहर आ चुका है
उसने ब्रश फेंक दिया है
और अब
वह भीड़ में खड़ा
किसी और चित्र का
इंतजार कर रहा है।
बारिश रुक गई है
पर बूंदें अब भी गिर रही हैं
अंदर कहीं
जहां कोई आसमान नहीं होता।
न्यूरॉन्स अब संकेत नहीं भेजते
वे सिर्फ पुरानी तस्वीरों को
बार-बार जलाते हैं
और राख से
नई कैद बनाते हैं।
नन्ही गुड़िया अब जाग चुकी है
पर उसकी आंखों में
कोई सपना नहीं
सिर्फ एक खाली फ्रेम है
जिसमें
वह खुद को ढूंढती रहती है।
तिनका अब टूट चुका है
और उसके कण
हवा में नहीं
समय के भीतर
फैल गए हैं
हर क्षण
किसी अधूरे निर्माण की
खुजली लिए।
मैं जिस पेटी में सबको बंद कर रहा था
अचानक महसूस करता हूँ—
वह पेटी
बाहर नहीं
मेरे सीने के भीतर है।
चाबी जिसे मैंने फेंक दिया था
वह वापस आकर
मेरी जीभ के नीचे
छुप गई है
पर मैं बोल नहीं सकता।
कैमरा अब मेरे हाथ में नहीं
वह मेरी आंख बन चुका है
और हर पलक झपकना
एक स्थायी कैद है।
क्लोजप…
इतना करीब
कि चेहरे गायब हो गए
सिर्फ त्वचा बची है
और उसके नीचे
धीरे-धीरे सड़ता हुआ
समय।
मनकर्णिका अब बाहर नहीं
मेरे भीतर जल रही है
हर विचार
एक चिता है
जिसे मैं
खुद ही आग देता हूँ।
लकड़हारे फाइलें नहीं
नाम जला रहे हैं
पहचान
धुएं में बदलती है
और आसमान
उसे वापस नहीं लेता।
अब कोई कैदी नहीं
कोई जेल नहीं
सिर्फ फ्रेम हैं
एक के भीतर एक
अंतहीन।
और हर फ्रेम में
एक आदमी
खड़ा है
क्लिक होने का
इंतजार करता हुआ—
क्लिक…
पर तस्वीर
कभी पूरी नहीं होती।
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