।। …सूखे की देह में बचा हुआ मनुष्य… ।।
तुम
जब भी आते हो—
अपने साथ महुआ नहीं,
सूखे की एक लंबी दरार ले आते हो।
तुम्हारी हथेलियों पर
इमली नहीं होती अब,
बस उसकी खटास बची होती है—
जैसे जीवन
धीरे-धीरे अपने ही स्वाद से कटता जा रहा हो।
तुम कहते हो—
मराठवाड़ा में इस बार
बारिश आई थी थोड़ी-सी…
पर उस “थोड़ी-सी” में ही
पूरा एक अधूरा सावन छिपा होता है।
यहाँ
धरती खेत नहीं रही,
एक फटी हुई हथेली है—
जिसमें बीज नहीं,
बस इंतज़ार बोया जाता है हर साल।
कपास के फूल
अब सफ़ेद नहीं लगते,
वे किसी अधूरी चिट्ठी जैसे हैं—
जिसे किसान
हर मौसम में लिखता है
और हर बार
बिना जवाब के जला देता है।
तुम
जब ज्वार की बात करते हो,
तो लगता है—
हर दाने में
एक सूखी नदी की दरार है।
और उन दरारों के किनारे
बैठे हैं लोग—
जिन्होंने पानी से ज़्यादा
कर्ज़ का स्वाद चखा है।
फिर भी—
पोला आता है
तो बैल सजते हैं,
दीवाली आती है
तो मिट्टी के घरों में दीये जलते हैं।
जैसे
जीवन हार मानना नहीं जानता,
चाहे भीतर कितना भी सूखा क्यों न हो।
पर उसी रोशनी के पीछे
एक लंबी अँधेरी रात है—
जहाँ कई नाम
सुबह तक
ख़ामोश हो जाते हैं।
तुम कहते नहीं—
पर मैं जानती हूँ
कि अब
रस्सी और कीटनाशक
सिर्फ चीज़ें नहीं रहीं,
वे धीरे-धीरे
निर्णय बनती जा रही हैं।
और फिर
घोषित कर दी जाती है
“सामान्यता”—
जैसे
सब कुछ ठीक है,
जैसे
मरना भी
अब इस मिट्टी की आदत हो।
तुम लौटते हो—
खाली हाथ,
थकी हुई देह,
और आँखों में
उबलता हुआ पानी
जो बरस नहीं पाता।
तुम रोते नहीं—
क्योंकि यहाँ
आँसू भी
संभालकर रखने पड़ते हैं
अगले सूखे के लिए।
मैं तुम्हें रोकती नहीं—
बस इतना कहती हूँ—
उस सूखी धरती से कहना,
मैंने तुम्हें निहत्था भेजा है।
क्योंकि
यहाँ
हथियार सिर्फ बंदूक नहीं होते—
कभी-कभी
सूखा,
कर्ज़
और चुप्पी—
मिलकर
मनुष्य को
सबसे ख़तरनाक हथियार बना देते हैं।