मैं लिखती हूँ—
लिखती हूँ क्योंकि
कुछ लफ़्ज़ मुझे बहुत पसंद हैं,
और कुछ लफ़्ज़ों को
मैं बहुत पसंद हूँ।
खामोशी में वो
मेरे हमदर्द बन जाते हैं,
उदास हूँ तो
मेरी आँखों से बह जाते हैं।
उमंग में
मेरी हँसी से लिपट जाते हैं,
कोई याद आए तो
कोरी आँखों में सिमट जाते हैं।
कभी तन्हाई घिर आए
तो चुपचाप मेरे पास बैठ जाते हैं,
जहाँ मैं खुद से हार जाऊँ
वहीं मुझे थाम जाते हैं।
और सच कहूँ,
मैं लिखती नहीं हमेशा,
कभी-कभी ये लफ़्ज़ ही
मुझे लिख जाते हैं।