चिराग जला लेता हूँ
आफताब बुझा करके
पुराना दर्द भुल जाते हैं हम
नया दर्द दिल में बसा करके के
चिरागों की सोहबत में रहते हो शायद
उजाला रख जाते हो मेरी दहलीज पे मुस्कूरा करके
अश्कों से सिंचता हूँ रोज सुबह ओ शाम
जख्मों को रखता हूँ मैं हरा भरा करके
मत मचाओ शोर ऐ जहान वालों
बस अभी सोया है दर्द मुझको रुला करके