मेरे आंसुओं की नमी पे
तितलियों की कतारें मिलती हैं
हम मुंह फेर कर घर लौट आते हैं
राह में जब कभी बहारें मिलती हैं
मुझे नबीना न कर, ऐ गर्द रास्तों की
उसकी निगाहें मुझसे आते जाते मिलती हैं
अब घटाऐ बरसती नहीं,पहले जैसी
छाता घर पे रहने दो, कौन सी बौछारे गिरती हैं
जाने क्या दुश्मनी है इस शहर से मेरी
मुस्कुराते हैं हम तो तलवारें निकलती हैं