मैं और मेरे अह्सास
याद करते वो बहाने से
शुक्रगुजार है याद करते वो बहाने से l
लगाता है कि बहुत डरते है ज़माने से ll
आंख मिचकर कूदे इश्क़ के रोजगार में l
एक बार भी नहीं सोचा दिल लगाने से ll
लाख कोशिश करलो जाने वाला कभी l
कोई वापिस नहीं लौटता है मनाने से ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह