समाज का वो आईना, जिसे हम अक्सर साफ करने से डरते हैं। क्यों एक बेटी का अस्तित्व सिर्फ उसके ससुराल और उसकी मौत तक ही सीमित रह गया है? इन सड़ते हुए रीति-रिवाजों को कब तक ढोएंगे हम? आपकी क्या राय है, क्या ये समाज वाकई बदल सकता है? 🥀
ये समाज मरी हुई बेटी की लाश तो घर ला सकता है,
पर ब्याही हुई बेटी को सम्मान से घर पर नहीं रख सकता।
ये समाज एक विधवा बेटी को बेबस-लाचार बना सकता है,
पर दूसरी शादी कराकर उसका जीवन फिर से नहीं सजा सकता।
ये समाज एक छोटी सी बच्ची को बुरी नजरों से देख सकता है,
पर बेटियों को खुली हवा में साँस लेने की आजादी नहीं दे सकता।
ये समाज बेटियों के 'चरित्र' पर सवाल उठा सकता है,
पर जो उन्हें घूरते हैं, उन्हें नजरअंदाज कर सकता है।
ये समाज परंपराओं का ढोंग तो खूब निभाता है,
पर 'इंसानियत' के नाम पर अपनी ही बेटी को पराया बना जाता है।
बेटी की खुशियों को अपनी मर्जी से तौलता है ये समाज,
और फिर कहता है— 'बेटी बचाओ' का फितूर पालता है ये समाज!
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