जागते आंखें थक गई
गीत या कविता
जागते जागते आंखें थक गई
अब जागे रहना मुश्किल है
मुश्किल है
आंखें खोल कर दुनिया की रंगटे देखना
देखना दुनिया की तोर तरीके
और खुद को भूल जाना
डर लगता है खुद को खोने से
डर लगता है हां खुद को खोने से
खुद को खोने से
खुद को खोकर किसी और की होने से
अब जागना मुश्किल है
मुझे सोने दो
सपनों में ही हमसफर जहां मुझे खुद के होने दो
मुझे जागना नहीं सोना है
रोते-रोते पलके मोटी हो गई है
मुझे अब हंसना है
यह प्रकृति का नियम है
जिंदगी है या मौत सब के हिस्से आना है
फिर इस बात से क्यों डरना है
यह प्रकृति का नियती है
किसी को ज्यादा गम किसी को काम गम मिलना है
इस से क्या डरना है
मैं प्रकृति का एक कन हुं
ब्रह्मांड का एक कटरा
फिर हमें इन्हीं में मिल जाना है
मुझे अब नहीं जागते रहना मुझे अब सोना है
जो होगा कल देखा जाएगा
आज मुझे आराम करना है
डर मुझे कल की निश्चित से नहीं है
डर है मुझे खुद को खो देने से
डर मुझे अंत से नहीं है
डर है मुझे खुद से दूर हो जाने से
खुद की करीब हर पल रहना चाहती हूं
जागते और सोने के बाद भी
जागते हुए
कठोर लग रहा है दुनिया
और इस दुनिया मैं आते हुए मैं खुद को खो देता हूं
मुझे ऐसा लग रहा है
हां मुझे ऐसा लगता है
यह दुनिया मेरा अपना कहां लगता है
मुझे जागना नहीं सोना है
कुछ देर ही सही खुद का होना है
आराम है वहां जहां मैं खुद की ही हूं
दर्द है जहां मैं जहां मैं खुद की नहीं हूं
यह मेरा होना खुद का थोड़ी खुदगर्जी है
पर यही मुझको राहत देती
मेरी इसमें मर्जी है
मेरा होना खुद का थोरी खुदगर्जी है
और मुझे यही राहत देती
मेरी इसमें मर्जी है
हां खुदगर्जी है
पर यह मेरी मर्जी है
जागते जागते थक गई
अब आंखें बंद करना दर्द मन की जरूरत है