“दाग़ और रोशनी”…….
रात की चादर ओढ़े, छज्जे पे खड़ी थी,
दूर आसमान पर तन्हा चाँद को तक रही थी...
मन ने चुपके से पूछा
उजालों से भरा जहाँ छोड़ कर,
तूने ये अँधेरों का देस क्यों चुना, चाँद?
क्या किसी अपने ने तेरा आसमान छीना होगा?
जिस रात तुझे हौसले की बाँहों की ज़रूरत थी,
क्या तुझे वहीं अकेला तोड़ दिया होगा?
तब मेरी नज़र तेरे चेहरे के दाग़ों पे ठहर गई...
इतना नूरानी, चमकीला , दूध सा उजला है तू,
फिर तेरे दामन पर ये निशान किसने रख दिए?
शायद तूने भी किसी से हद से ज़्यादा इश्क़ किया होगा,
अपनी सारी चाँदनी उसकी हथेली पर रख दी होगी।
और उसने जब अँधेरा लौटाया,
तू ख़ामोश हो कर फ़लक के कोने में जा बैठा होगा।
ये दाग़ तेरे ज़ख़्म नहीं, तेरी वफ़ा की लकीरें हैं,
हर उस वादे का सबूत जो निभाया नहीं गया,
हर उस साथ की याद जो अधूरा रह गया।
फिर भी देखो...
दाग़ों के बावजूद तू पूरा है,
टूट कर भी दुनिया की रातें सँवारता है।
तब समझी मैं...
चाँद सबका इसीलिए है,
क्योंकि उसने अपना दर्द छुपाया नहीं
उसे रोशनी में बदल कर बाँट दिया।
और मैं?
मैं भी थोड़ी चाँद हूँ, माँ।
दाग़ों के साथ ही सही, पर मुस्कुराती हूँ।
किताबों की रोशनी से अपनी रात सजाती हूँ,
और उम्मीद है, किसी और की रात भी।
प्राची तंवर……