वो बचपन कितना प्यारा था
वे चारों हमेशा साथ रहते
खाना भी ना खाते, एक-दूजे के बिना
बीती कितनी मस्ती भरी दोपहरियां सोय बिना
चोट एक को लगती थी,
दर्द सभी को होता था
शाम को अंताक्षरी सजती थी
जीतने के लिए शब्दकोश रटते थे दिन भर
कैरम, लूडो भैया ने सिखाए
खूब चाट पकौड़ी भैया ने खिलाए
अपने हिस्से का भी दीदी मुझे खिलाती थी
नींद खराब कर अपनी
रात को रोज पढ़ाती थी
जब मम्मी बाजार जाती थी
ऊधम बहुत मचाते थे
तोड़-फोड़ कर घर की चीजें
भोले बन पढ़ने बैठ जाते थे
पापा जब घर आते थे
बहुत सारी चीजें लाते थे
दिनभर की आपबीती सुनाते थे
वो बचपन कितना प्यारा था
हम एक साथ रहते थे
क्यूं हम इतने बड़े हो गए
एक-दूजे के लिए मेहमान हो गए
अब तो राखी पर भी नहीं मिलते
सब अपनी जिंदगी जीते
भाई बहन चारों जुदा हो गए
---dr वंदना शर्मा पांडव नगर नई दिल्ली