मैंने आज़ादी की लड़ाई नहीं देखी, पर आज उसकी छवि देखी। कुछ ऐसी ही होगी वह जंग, जहाँ रक्षक ही भक्षक बनकर सामने खड़े होंगे; जहाँ बच्चे, बूढ़े, बड़े और जवान—सभी लड़ रहे होंगे, शांति पूर्वक आंदोलन कर रहे होंगे।
इस आंदोलन में अनेक चेहरे होंगे—एक माँ, जिसका इकलौता बेटा इस व्यवस्था में पिस गया होगा; एक बाप, जो अपने बच्चे की लड़ाई लड़ने आया होगा; अनेक बच्चे, जो अपने भविष्य के लिए जुटे होंगे; और भी अनेक चेहरे, जो अपने दर्द को छिपाए उस भीड़ में खड़े होंगे।
तभी दूर से धमकियों की आवाज़ आई होगी। डंडों, लाठियों और गैस के गोलों के चलने का आगाज़ हुआ होगा। पर आंदोलनकारियों ने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया होगा। उन्होंने सोचा होगा, "आख़िर ये भी तो हमारी तरह ही इंसान हैं। थोड़ी-बहुत इंसानियत तो इनमें भी बची होगी। कम-से-कम बच्चों, लड़कियों और छात्रों पर तो ये बल का प्रयोग नहीं करेंगे।"
पर जब हैवानियत का वह रूप देखा, तो बची हुई उम्मीद भी टूटती हुई नज़र आई। जो लोग शिक्षा-व्यवस्था का स्वरूप बदलने निकले थे, वे खड़े हुए और बोले, "वाह, सर! क्या ख़ूब काम किया है। बच्चों, लड़कियों और छात्रों पर लाठियाँ बरसाकर, गैस के गोले चलवाकर उनका बुरा हाल कर दिया, और आप मुस्कुरा रहे हैं। चलिए, आज हमने भी तालियों से आपका सत्कार किया है।"
जाते-जाते आपने हमारी इस जंग को और भी परिष्कृत कर दिया है।