कविता
सांसे चल रही है थम थम कर
सांस थम रही है जिंदगी कट रही है
मंजिल अभी बहुत दूर है
कभी-कभी लगता है सांस रोक लु
और आखिरी वक्त को महसूस करु
और उस वक्त मैं सोचूं कि मैं कहां हूं
ऐसा लगता है कि
मैं इस वक्त में भी यही हूं
कहीं-कभी पहुंचा ही नहीं
अभी तन्हा अकेला टूटी हुई
अपनी कमजोरी पैरों पर रोती हुई
तो
कभी-कभी लगता है
मैं आंखें बंद कर लूं
और सो जाओ
और किसी सुनहरी सपनों में खो जाऊं
यही मेरी मंजिल होगी
जिस चीज की मुझे शौक है
वह कहानी है
मेरे सपने भी तो हर एक नियंत्र दिन
एक नई कहानी मेरे सामने लाता है
तो क्यों ना मैं उसे ही देखती रहुं
उसकी ही किरदार बनाकर जीते हुए जिंदगी बिता दु
बिना कोई जोखीम लिए
बस उम्र ही तो बितानी है
बिना कोई खुद की जिम्मेदारी उठाएं
वहां जीते रहो जहां मैं खुश रह सकूं
तो
कभी-कभी लगता है
हां मुझे कहानियों का शौक है
बस देखने की नहीं लिखने की भी
हां मैं जानती हूं कि
मैं अपने सपनों में रचयिता नायक दर्शन दर्शक सब हुं
पर यह क्या काफी है
इस बेकार जिंदगी को बिता देने के लिए
बस सपने हैं
जहां मैं अपने सब कुछ हूं
बहुत सारे सवाल है
खुद को बेकार समझते हुए
कभी-कभी लगता है कि
मैं आलसी हूं
मैं करना ही नहीं चाहती कुछ भी
तो कभी-कभी लगता है
कि मुझसे होता ही नहीं
मैं आलसी नहीं हूं बस थक गई हूं
इस जिंदगी से
हर दिन एक जैसे दिन गुजर से
मैं थक गई हूं
खुद ही से
तो कभी-कभी सोचता हूं कि
मैं कब तक थकी ही रहूंगी
यह थकावट कभी खत्म होगी भी या नहीं
सालों बीत गए हैं इसी हाल में
और एक ही सवाल में
मैं क्या कर रही हूं
क्यों कर रही हूं
मुझे सोते रहना क्यों है
मैं खुद को इस थकावट से
आजाद क्यों नहीं कर पा रही
हालांकि मुझे बहुत सारे सवालों की जवाब भी पता है
फिर भी दर्द हो रहा है
मैं निकल नहीं पा रही दर्दनाक जंजीर से
मुझे बोरिया फिल हो रही है
मुझ में धैर्य नहीं है
फिर भी रोज-रोज एक ही काम कर रही हूं
सो कर उठना
और फिर छोटे-मोटे काम करना
और फिर बेकार जिंदगी गुजारने के बाद
फिर से सो जाना
यह वक्त की बर्बादी और खुद की भी है
मैं दोनों बर्बाद कर रही
कभी-कभी खुद पे गुस्सा आता है
कभी-कभी दया
मैं क्या करूं
मैं चाह कर भी खुद को मेंटेन नहीं कर पा रही
मैं खुद को और अपनी जिंदगी को बेकार जाने से नहीं रोक पा रही
सांसे चल रही है थम थम कर
जी भी रही हूं घुट घुट का
अभी यह आलम है कि
जिंदा होकर भी लाश की तरह महसूस हो रही है